सोधी जे

अुकशर्क

सुझा साहित्य मण्ड्ी ;। दल्ल ]

सकाशक पै मातण्ड उपाध्याय मंत्री, सत्ता साहित्य मएडरू, दिल्ली

संस्करण $-- पहलीवार, सन्‌ १६३२ : ४००० दूसरीवार, सन्‌ १६३८ + ३०००

मूल्य डेढ़ आना

झुद्गक, - रतन प्रेस, ( रजिस्टडई ),

दिल्ली

मंगलप्रभात

यरवडा जेल का गाँधी जी यरवड़ा मन्दिर! नाम रक्खा वहाँ उन्हें चाहर के कुछ अखबार तो पढ़ने को मिलते थे ओर आश्रम थोक को थोक चिट्टियां आती, फिर भी यह निवृत्तिका समय उन्होंन सूत्रयज्ञ मे और चर्खे की भक्ति में ओर गीता के मनन में ही विताया ग्रह कहना ठीक ही होगा | इस बीच में सावर- मती आश्रम के जीवन में अधिक चंतन पहुंचा ने की आवश्यकता है ऐसी मांग एक दो भांइयों को ओर से होने के कारण इन्होंने आश्रम- वासियों के नास साप्ताहिक पत्र लिखने शुरू किये | कोइ भी कास शुरू करके वह नियसित होना हो चाहिए गांबी जी का ऐसा आग्रह होने के कारण हर मंगलवार को सवेरे की प्राथना के बाद एक प्रवचन लिखकर भेजने का उन्होंने संकल्प किया। इस संकल्प का प्रथम फल आश्रम के ब्रतां पर उनका भाष्य है।

( )

ये प्रवचन मंगलवार को सवेर लिखे जाते श्र इसलिए इन प्रवचरना के संग्रह का नाम 'मंगलप्रभा?” रखा गया है। हमारे राष्ट्रीय जीवन में जब घोर निशा का साम्राज्य विस्तृत था उस समय जिन ब्रत्तों ने राष्ट्रीय जीवन में गआ्राशा, आत्म-विश्वास, स्फूर्ति और धार्मिकता का वातावरण पैदा किया उन ब्रतोंने ही अन्त में एक नवीन संस्कृति का मंगलप्रभात आरम्भ क्रिया इसे मानने में क्या तनिक भी अत्युक्ति है !

दात्रेय वालकृष्ण काललकर

(४ “५१ ०८ «७४ कि

११ १२ १३ १४ १० १६

सत्य

अहिंसा

्रह्मचये

अस्वाद

अस्तेय

अपरियप्रदे

अभय अस्पृश्यतानिवारण कारयिकरपरिश्रम

सब घम समभाव--१ सब घमं समभसाव--* नम्रता

स्वदेशी

स्वदेशी न्रत

त्रत की आवश्यकता परिशिष्ट

मद्लप्रभात

स्त्थ प्रातःकाल की प्रार्थना के वाद २२०-७*०३०

हम लोगों की संख्या की जड़ ही सत्य के आग्रह में है (इसलिए सत्य को ही प्रथम लेता हूँ।

'सत्यः शव्द्‌ सत्‌ से बना है। सत्‌ ्रथात्‌ होना सत्य है होनापन | और सत्य के सिवा दूसरी किसी चीज़ की हस्ती ही नहीं है। इसीलिए परमेश्वर का सच्चा नाम दी 'सत्‌ः अ्रथोत्‌ सत्य! है। इसलिए परसेश्वर “सत्य” है यह कहने के वजाय सित्यः-ही परमेश्वर है यह कहता अधिक उपयुक्त है | हम लोगों का. .काम राजा बिना, सरदार घिना नहीं चलता, इसीसे पर-

मद्न्‍जलप्रभात

पेश्वर नाम अधिक प्रचलित है ओर रहेगा। लेकिन सोचने से तो 'सत्‌” या “सत्य” ही सच्चा नाम है ओर यही पूरा अथ प्रकट करता है।

ओर जहां सत्य है वहाँ ज्ञान-शुद्ध ज्ञान-है ही जहाँ सत्य नहीं है वहाँ शुद्ध ज्ञान सम्भव नहीं हो सकता इसीलिए इंश्वर नाम के साथ “चित अर्थात्‌ ज्ञान शब्द क्री योजना हुई है और जहाँ सत्य ज्ञान है वहाँ आनन्द ही होगा, शोक होगा ही नहीं ओर, संत्य शाश्वत है इसलिए आनन्द भी शाश्रतं होता है। इसी कारण हमे इंश्वर को सच्चिदानन्द के नाम से भी सममंते हैं |

इस सत्य की आराधना के लिए ही हमारा अस्तित्व है इसीके लिए हमारी हरेक भ्रवृत्ति है, इसीके लिए हमारा प्रत्येक श्वासोच्छुवांस होना चाहिए। ऐसा करना सीख लें तो हमें ओर सब नियम अपने आप हाथ आंजायें और उनका पालन भी आसान हो जाय। सत्य के

संत्य

बिना किसी भी नियम का ठीक ठीक पालन अशक्य है।

आमतौर से सत्य का अथ हम 'सच बोलना” बस इतना ही सममते हैं। लेकिन हमने सत्य शब्द का व्यापक अथ में प्रयोग किया है ब्रिचार में, बाणी में, और आचार में सत्य ही सत्य ही इस सत्य को सम्पूररतः समभन्तेवाले के त्रिएजगतर्म ओर कुछ ज़ानने को नहीं रहता क्योंकि: सम्पूर्ण ज्ञान उसमें समाया हुआ है यह हम ऊपर देख चुके हैं। इसमें जो संमाय बह सत्य नदींहे, ज्ञान नहींहे, फिर उसमें से सच्चा आनन्द तो मिल ही कैसे सकता है ! यादि हम इस कसौटी को काममें ,ल्ाना सीख जांयेँ तो हमें तुरन्त यह मालूम हो जाया करे कि कोन- सी प्रवृत्ति करने योग्य है, और कोन-सी त्याज्य, क्या देखने योग्य है,. क्‍या नहीं, कया पढ़ने योग्य है, क्‍यां नहीं |

मन्नलग्नभात

पर यह पारस-मणिन्खूप, कामधेनु-रूप

सत्य, मिले केसे | इसका जवाब भगवान्‌ ने दिया है। अभ्यास ओर वैराग्य से | सत्य की टी घालामेली अभ्यास है” ओर उसके सिवा ओर संब वस्तुओं के लिए आत्यन्तिक उदा- सीनता वैराग्य है यह होते हुए भी दवम देखा गे कि जो एक के लिए सत्य है वह दूसरे के लिए असत्य है। इससे घबड़ाने का कारण नहीं जहाँ शुद्ध प्रयत्न है, वहाँ भिन्न मालूम होनेवाले सब सत्य एक ही पेड़ के असंख्य भिन्न दीख पड़नेवाले पत्तों के समान हैं पर- मेश्वर भी क्या हर आदसी को भिन्न नहीं दिखाई देता ? फिर भी हम जानते हैं कि वह एक ही है पर सत्य नाम ही परमेश्वर का है, इसलिए जिसे जो सत्य जान पड़े तदनुसार वह आचरण करे तो उसमें दोष नहीं, यही नहीं, बल्कि षही कत्तव्य' है यदि ऐसा करने में भूल होगी भी

द्‌

सत्य

तो वह जरूर सुधर जायगी। क्योंकि सत्य की खोज के साथ तपश्चर्या होती - है, अथोत्‌ स्वयं दुःख सहन करना होता है। उसके पीछे मरना होता है, इसलिएः उसमें रा की तो गन्ध तक नहीं होती ऐसी. निःस्वाथं खोज करते हुए कोई आखिर तक ग़ल्नत रास्ते आजतक नहीं गया। तनिक इधर-उघर होते ही ठोकर लगती है ओर फिर वह सीधे रास्ते चलने लगताहै। अत: इसीसे सत्य की आराधना भक्ति है, ओर भक्ति तो 'सिर का सोदा है! अथवा वह हरिं का. मार्ग है, जिसमें कायरता के लिए स्थान नहीं, जिसमें हार जैसी कोई चीज़ है ही नहीं | वह तो 'सर कर जीने का मन्त्र” है |

पर अब हम अहिंसा के घिलकुत्न पास पहुंचे है। उस पर अगले सप्ताह विचार करूँगा।

इस प्रसद् में हरिश्वन्द्र, प्ह्माद, रामचन्द्र,|

हि

सन्नलप्रभात

इमाम हसन हुसेन, इसाई सन्तों आदि के दृष्टान्द विचारने थोग्य हैं। और श्रगले सप्ताह तक सब वालक-बढ़े, ज्री-पुरुप चलते, बैठते, खाते, पीते, खेलते, मतलब सारे काम करते हुए सत्य की रट लगाये रहें ओर ऐसा करते-करते निर्दोष नींद प्राप्त कर लिया करें तो क्‍या दी अच्छा हो ? यह सत्यरूपी परमेश्वर मेरे लिए तो रलचिन्तामणि सिद्ध हुआ है। सब के लिए सिद्ध हो

अहिसा

महश्नतप्रभाते

२९०७-०३

सत्यकी, अहिंसा की राह जितनी सीधी

है उतनी ही तड्ढ भी है; खांडे की घारपर चलने

के समान है | नट बड़ी सावधानी से जिस डोर

पर.चल सकता है सत्य और अहिंसा की डोर

उससे भी पतली है ज़रा चूके कि आये नीचे

धससे | पहनन्‍पकू की साधना से. ही उसके दशुन होते हैं

लेकिन संत्य के सम्पूर्ण दशन तो इस देह

से असम्भव हैं। उसकी केवल कल्पना भर की

जा सकती है। क्षणिक देह द्वारा शाश्वत घम का

साक्षात्कार सम्मव नहों होता। इसलिए अन्त में

रा

सहनलप्रभात॑

श्रद्धा के उपयोग की आवश्यकता वो रही जाती है इसीसे जिज्ञासु को अहिंसा मित्री। जिज्ञासु के सामने यह सवाल खड़ा हुआ कि मार्ग में आने वाले सछूटों को सहे या उसके लिए जो नाश करना पड़े वह करता हुआ आगे बढ़े उसने देखा कि जो नाश करता -है तो आगे नहीं बढ़ता, दूर पर ही रहजाता है।सड्डूट सहता है तो आगे बढ़ता है। पहले ही नाश में उसने देखा कि जिस सत्य की उसे तलाश है वह बाहर नहीं, भीतर है इसलिए जेसे-जैसे नाश करवा जाता है बैसे-वैसे पीछे पड़ता जाता है, सत्य दूर हटता जाता है हमें चोर सताते हैं अपनी रक्षा के लिए हमने उन्हें दुरड दिया उस समय वहाँ से जरूर वह भाग गये लेकिन दूसरी जगह जाकर सेंघ मारी पर वह जगह भी हमारी ही है। १०

भहिसा

यानी हम अंधेरी गली में जाकर टकराये। चोर का उपद्रव बढ़ता गया, क्योंकि उसने तो चोरी को अपना कत्तंद्य मान लिया है। हम देखते हैं कि इससे अच्छा तो यही है कि चोर का: उपद्रव सह लिया जाय | इससे उसे समर आवचेगी | इतना सहने पर हम देखेंगे कि चोर हमसे भिन्न नहीं है। हमारे तो सब सगे हैं, सब दोस्त हैं, उन्हें सजा नहीं दी जा सकती। लेकिन. उपद्रव सहते जाना ही बस नहीं है इससे कायरता पेदा होती है। अतः' हमें अपना दूसरा विशेष धर्म 'दिखाई दिया। चोर जब अपने भाई-बन्वु हैं तो उनमें वह भावना उत्पन्न करनी -चाहिए। अथांत्‌ हंमे उन्हें अपनांने का उपाय खोजने तक का कष्ट सहने को भी तैयार होना चांहिए। यहं अदिसा का मार्ग है इसमें उत्तरोत्तर ढुःखं संहंन का कार्म है, अटूटं धीरज सीखने का कार्म है। और यह हो जाय तो.

सइलमभात

अन्त में चोर साहूकार वन जाता है, हमें सत्य के अधिक स्पष्ट दशन होते है। इस प्रकार हम जगत को मित्र बनाना सीखते हैं, इश्वर की, सत्य की सहिमा अ्रधिक सममभते हैं; संकट सहते हुए भी शांति सुख बढ़ता है, हसमें साहस बढ़ता है, हम शाधत-अशाश्वंत का भेद अधिक समभने ज्ञगते हैं, कतंव्य अक्रत॑व्यका विवेक अ्रच्छा लगने लगता है, गये गल जाता है, नम्नता बढ़ती है, परिश्रह अपने आप घट जाता है और देह में भरा हुआ मेत्न रोज-रोज कमर होंता जाता है।....

यह अहिंसा वह स्थूज्ञ वस्तु नहीं है जिसे आज हम देखते हैं। किसी को मारना तो है ही। बुरे विचारमात्र हिंसा है, उतावली (जल्द-बाजी) हिंसा है, मिथ्याभाषण हिंसा है देघ हिंसा है, किसी का बुरा चाहना हिंसा है, जगत्‌ के लिए जो वस्तु आवश्यक है उस पर

१२

अहिसा

कठ्जा रखना भी हिंसा है। लेकिन हस जो खाते हैं. वह जगत्‌ के लिएं आवश्यक है, जहाँ खड़े हैं वहाँ सैकड़ों सूररंस जीव पंड़े पैरों तले कुचले जाते हैं, यह जंगह उनकी है। तो फिर क्या आत्म-हत्या करलें ? तो भी निस्तार नहीं विचार में देंह का संसगे छोड़ दें तो अन्त में देह हमें छोड़ देगी। यह मोह रहित खुरूप सत्यनारायण है। यह दर्शन अंधीरंता से नंहीं होते यह देह हमांरी नहीं है, हमें मिंली हुई घरोहर है ऐंसा समझ कर इसका उपयोग करते हुए हमें आंगे बढ़ना चाहिए

मुझे लिखना तो थां आसान, लिखा गयां मुश्किल | तथापि जिसने अहिंसा का थोड़ां भी विचार किया होगा उसे सममने में कठिनाई नपड़नी चाहिए।

इतना सब समम्त लें कि अहिंसा वित्तां सत्य की खोज असम्भव है। अ्रहिंसा और संत्य

१३

मंगसप्रभात

सिक्के की दोनों बाजुओं था चिकनी चकती के दोनों पहलुओं की भाँति विलकुल एक समान हैं, उसमें उल्टे-सीपे की पहचान केसे हो तथापि शहिंसा को साधन ओर सत्य को साध्य मानना चाहिए। साधन हमारे हाथ को वात है. इससे अहिंसा परम घर्म मानी गई। सत्य परमेश्वर हआ साधन की चिन्ता करते रहेंगे तो साध्य के दशरन किसी दिन कर ही लेंगे। इतना निश्चय कर लिया तो जग जीत लिया | हमारे मार्ग में चाहें जितने संकट; आदें, वाह्म दृष्टि से हमारी चाहे जितनी हार होती दिखाई दे, तो भी हमें विश्वास छोड़कर एक ही सन्त्र

जपना चाहिए :--सत्य है, वही है, वही एक परमेश्वर है। उसके साज्षात्कार का एक ही मार्ग- एक 'ही साधन-अहिंसा है, उसे कभी छोडंगा जिस सत्यरूप परमेश्वर के नाम से यह प्रतिज्ञ| की है वह उसके पालन करने का वल्त दे |

१४

ब्रह्मचय ' मंगलप्रमात ७-८०

हमारे भ॒तों में तीसरा त्रतः त्रह्मचय का है। वासव में तो दसरे सभी प्रत एक सत्य के व्रत में से ही उत्पन्न होते हैं और उसीके लिए उनका अस्तित्व है। जिसने सत्य का आश्रय लिया है, उसीकी उपासना करता है, वद। दूसरी किसी भी वस्तु की आराधना करे तो व्यभि- चारी. वन गया फिर विकार की आराधना तो .की ही. कैसे जासकती है? जिसकी सारी प्रवृत्तियाँ एक सत्य के दशंत के लिए दी हैं वह सनन्‍्तान उत्पन्न करने था घर गिरस्ती

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मज्ञलपसभांत

चलाने में पड़ ही केसे सकता है ? भोगविलास द्वारा किसीको सत्य प्राप्त होने की आजतक एक भी मिसाल हमारे पास नहीं है

अहिंसा के पालन को लें तो उसका पूरा- पूरा पालन भी ब्रह्मचय के बिना असाध्य है। अहिंसा अथांत्‌ सर्ब-व्यापी श्रेस। जिस पुरुषने एक श्री को या जी ने एक पुरुष को अपना प्रेम . सोंप दिया उसके पास दूसरे के लिए क्या बच गया इसका अथे दी यह हुआ कि हम दो पहले ओर दूसरे सब बांद फो पतित्रता ख्री पुरुष के लिए ओर पत्नीत्रती पुरुष स्त्री के लिए सर्वस्तर होमने को तैयार होगा, इससे यह स्पष्ट है कि उससे संबेव्यापी प्रेम का पालन हो ही नहीं सकता। वह सारी रष्टिको अपना कुट्ुम्ब वना ही नहीं सकता, क्‍योंकि उसके पास उसका अपना माना हुआ एक कुटुम्ब मौजूद है था तैयांर हो रहा है जितनी उसकी चृद्धि उतना

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ब्रह्मचय ही सवब्यापी प्रेम में विक्षेप होगा सारे जगत में हम यही होता हुआ देख रहे हैं। इसलिए अहिसाब्रत का पालन करनेवाला विवाह के बन्धन में नहीं पड़ सकता; विवाद्द के बाहर के विकार की तो वात्त ही क्या ? तब जो विवाह्द कर चुके हैं उनकी गति उन्हें सत्य की प्राप्ति कमी होगी ? वे कभी सर्वापण नहीं कर सकते हमने इसका रास्ता निकाला ही है :--विवाहित अविवाहितन्सा हो जाय। इस बारे में इससे चढ़कर मुमे; दूसरी वात नहीं मालूम हुईं | इस स्थिति का मजा जिसने चखा है, वह गवादी दे सकता है आज तो इस प्रयोग की सफलता सिद्ध हुई कही जा सकती है| विवाहित स्त्री-पुरुप का एक दूसरेको भाई बहन मानने लगजाना सारे भगड़ों से मुक्त हो जाना है। संसार भर की सारी स्त्रियाँ बहनें हैं, माता हैं, लड़की हेँं--यह विचार हो मनुष्य 2; १७

मझ्लपभात

को एकदम ऊँचा ले जानेवाला है, बन्धन से मुक्त कर दैनेवाल्ा हो जाता है | इसमें पति-पत्नी कुछ खोते नहीं, उल्टे अपनी पूँजी बढ़ाते हैं, कुटुम्ब बढ़ाते हैं, प्रेम भी विक्रार रूप मैल के निकालने से बढ़ता है| विकार चले जाने से एक दूसरे की सेवा भी अधिक अच्छी हो. सकती है, एक दूसरे के बीच कलह के अवसर कम होते हैं। जहाँ स्वार्थी, एकांगी प्रेम है, वहाँ कलह के लिए ज्यादा गुज्नाइश है

उपरोक्त प्रधान विचार कर लेने और उसके हृदय में बैठ जाने के बाद ब्रह्म चय से होने वाले शारीरिक लाभ, वीय-रक्षा आदि बहुत गौड़ हो जाते हैं जान बुककर भोग-वित्ञास के लिए वबीय खोना ओर शरीर को निचोइना कितनी बढ़ी मूखता है ? वीय का उपयोग तो दोनों की शारीरिक और मानसिक शक्ति को बढ़ानेके लिए है। विषय-भोग में उसका उपयोग

१८

८. प्रह्मचय

करना उसका अति दुरुपयोग है, और इस कारण वह वहुतेरे रोगों की जड़ बन जाता है। ऐसे ब्रह्मचय का पालन मन, वचन ओर

काया से होना चाहिए। सारे व्रतों के विपय में यही वात है हमने गीता में पढ़ा है कि जो शरीर को वश में रखता हुआ जान पड़ता है, पर सन से विकार का पोषण किया करता है, वह सूद मिथ्याचारी है। सबको इसका अनुभव होता है। मन को विकारी रहने देकर शरीर को दबाने की कोशिश करना द्वानिकर ही है। जहाँ मन है, वहाँ अन्तको शरीर भी घसिटाये बिना नहीं रहता। यहाँ एक भेद संमक्कत लेना जरूरी है। सन को विकारवश होने देना एक बात है, ओर मन का अपने आप, अनिच्छा से, बल्ात विकार को प्राप्त.हो जाना था होते रहना दूसरी बात है। इस विकार में यदि हम सहायक बनें तो अन्त में जीत ही है | हम प्रतिपल यह

१९

मदुलप्रभात

अनुभव कंरते हैं कि शरीर तो काबू में रहता है, पर मन नहीं रहता इसलिए शरीर को तुरन्त ही वश में करके मन को वश में करने का हम सतत यत्न करते रहें तो हमने अपने कत्तेव्य का पालन कर दिया। हम मन के अधीन हुए कि शरीर और मन में विरोध खड़ा हो जाता है, मिथ्याचार का आरम्भ हो जाता है पर कह सकते हैं कि मनोविकार को दवाते दी रहने तक दोनों साथ-साथ जानेवाले हैं।

इस ब्रह्मचय का पालन बहुत कठिन, लग- भंग असंभव माना गया है। इसके कारण की खोज करने से मालूम होता है कि प्रद्मचय का संकुचित अर्थ किया गया है। जननेद्विय-विकार के विरोधमात्र को ही त्ह्मचय का पालन मान लिया गया है! मेरी राय में यह अधूरी और गलत व्याख्या है। विषयमात्र करा निरोध हो त्रह्मचय है। जो और-ओर इन्द्रियों को जहाँ:

र्०

प्रद्धचनय

तहाँ भटठकने देकर केवल एक ही इन्द्रिय को' रोकने का प्रयत्त करता है वह निष्फल प्रयत्न करता है, इसमें सल्देह क्‍या है? कान से विकार की बाते घुनना, आँख से विकार उत्पन्न करनवाली वस्तु देखता, जीभ से विकारोत्तेजक चस्तु का स्वाद लेना, हाथ से विकार्स को उभारनेवाली चीज को छूना ओर जननेस्द्रिय को रोकने का इरादा रखना, यह तो आग में हाथ डालकर जलने से बचने का .यत्न करने जैसा है। इसलिए जो जननेद्विय को रोकने का निश्चय करे उसका सभी इन्द्रियों को अपने- अपने विकारों से रोकने का निम्चय पहले फिया हुआ होना चाहिए। मुझे! सदा ऐसा जान पढ़ा है कि तह्माचय की संकुचित ध्याख्या से नुक्सान हुआ है | मेरा तो यह निश्चित सत है ओर अनुभव है कि यदि हम सच इन्द्रियों को एक साथ बश में करने का अभ्यास करे तो जनमेन्द्रिय[

२१

भंगलप्रभात

को वश में करने का प्रयत्न शीघ्र ही सफल हो सकता है। इनमें मुख्य वस्तु स्वादेन्द्रिय है | इसीलिए उसके संयम को हमने अथक्‌ स्थान दिया है। उस पर अगल्ली वार विचार करेंगे।

ब्रह्मचयें के मूल कम को सव याद रक्खें। ब्रह्मचय अथात्‌ त्रह्म की-सत्य की-शोध में घर्या, अर्थात्‌ तत्‌ सम्वन्धी आचार | इस मूत्र अर्थ से सर्वेन्द्रियःसंयम का विशेष अथ्थ निक- लता है। केवल जननेन्द्रिय-संयम के अधूरे अर्थ को तो हमें भूल ही जाना चाहिए।

जअजसवाद

महछूलप्रभात १२--८--३०

त्रह्यचय से यह त्रत बहत घनिष्ट सम्बन्ध रखनेवाला है। मेरा अनुभव ऐसा है कि त्रत का पालन किया जा सके तो बत्रह्मचय अथात्‌ जननेन्द्रिय-संय्स विलकुल्न सहज्ञ हो जाय | परन्तु सावारणतया इसे ब्रत में प्रथक्‌ खान नहीं दिया जाता। खाद को बड़े-बड़े मुनिवर भी नहों जीत सके, इसीलिए इस ब्रत को प्रथक्‌ स्थान नहीं मित्षा यह ती केबल मेरा अनुमान है ऐसा हो या न् हो, पर हम लोगों ने इस व्रत को प्रथक स्थान दिया है इसलिए इस पर स्वतंत्र रूप से विचार कर लेना उचित €।

अस्वाद का अथ होता है स्वाद लेना।

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मंगलप्रभात

स्वाद साने रस | जिस तरह दवा खाते समय वह स्वादिष्ट है या नहीं, इसका चिचार नहीं करते, वल्कि शरीर को उसकी आवश्यकता है यह समभकर उसे उचित परिणाम में ही खाते हैं, उसी तरह अन्न के विपय में समभना चाहिए। अन्न से मतत्वसमत्त खाद्य पदार्थों से है। इसलिए यहाँ दूध ओर फल उसमें जाते हैं। जैसे दवा नियत परिमाण से कम खाने पर लाभ नहीं होता अथवा कम होता है ओर अधिक परिमाण में खाने से हानि होती है, वैसे ही अन्न के सम्बन्ध में है। इसलिए किसी भी वस्तु को स्थाद के लिए चखना व्रत का भंग है। स्वादिष्ट लगनेवाली वस्तु अधिक परिमाण में लेना तो अनायास ब्रत का भंग हो गया। इससे यह समझा जा सकता है कि किसी चीज़ का स्वाद बढ़ाने या बदलने के लिए अथवा उसका अस्वाद मिटाने के . लिए

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अघ्वाद

उसमें नमक मिलाना ब्रत भंग है। परन्तु यदि हम जानते हों कि अन्न में अमुक परिसाण में नमक की जरूरत है ओर इस कारण उसमें नसक मिलावें, तो इसमें च्रत भंग नहीं है। शरीर पोषण के लिए आवश्यकता होने पर भी मत को ठगने के लिए आवश्यकता का आरोपण करके कोई चीज बढ़ा लेना तो सिथ्याचार मानना चाहिए।

इस हृष्ठि विचार करने पर हम सालूम होगा कि कितनी ही चीजें जिन्हें हम खाते हैं वे हमारी शरीर-रक्षा के लिए आवश्यक होने के कारण त्याज्य हो जाती हैं। ओर जिससे इस प्रकार अगणित चीजों का अनायास त्याग ही जाय, तो उसके समस्त विकार शान्‍न्त हो जाँय “दोले भर की जीम तेरह चीजें मांगती है” “पेट चाहे जो कराने”! इन -सव वबचनों में . बहुत अर्थ छिपा हुआ है;।.इस चिप्य, पर कम २५०

मगलगप्रभात

ध्यान दिया गया है कि व्रत की दृष्टि से आहार का चुनाव आय: असम्भव हो गया है | इसके सिवा वचपन से ही माता-पिता अनुचित प्रेम क्रे कारण, तरह-तरह के रवाद करा-कराकर शरीर को विगाड़ डालते हैं ओर जीभ को चटोरी बना देते हैं, जिससे बढ़े होने पर लोग शरीर से रोगी ओर स्वाद की द्रष्टि से महा विकारी दिखाई देते हैं। इसका कट फल हम पद-पद्‌ पर अनुभव करते हैं, बड़ें खर्चे में पड़ते हैं, वेच डाक्टरों की खुशामद करते हैं और शरीर तथा इन्द्रियों को बश में रखने के बढले उनके गुक्ञाम बनकर अ्रपंग की तरह जीते हैं एक अनुभवी वेद्य का कथन है क्लि उसने संसार में एक भी नीरोग मनुष्य को नहीं देखा जरा भी स्वाद के फेर में पढ़े कि शरीर चौपट हुआ ओर उसी ज्ञण से उस शर्यर के लिए उपवास की आवश्यकता उत्पन्न हुईं

रद

अस्वाद

इस विचार थघारा से किसीको घबड़ाने की जरूरत नहीं है अस्वाद त्रत की भयद्वरता देखकर उसे त्याग देने की भी जरूरत नहीं | जब हम कोई व्रत धारण करते हैं तो उसका अथ यह नहीं होता कि हंस उसी समय से उसका पूर्ण रूप से पाज़न करने लग गये। न्रत धारण करने का अथ होता है संपूर्ण रूप से उसके पालन का सब्ा ृह और सरणान्त मन, वचन ओर, कम से प्रयत्न करना कोई व्रत कठिन है इसलिए उसकी परिभाषा ढीली करके मन को घोखा देना चाहिए अपनी सविधा के लिए आदश को गिराना असत्य हूँ, अपना पतन है। आदश को खतंत्र रूप से जानकर, वह चाह जितना कठिन हो, फिर भी ससे प्राप्त करने का जी ज्ञान से अप्रयत्त करना, यही परस अथे है--पुरुषाथ है। पुरुष का अथ केवल “नर! करके मूल अर्थ करना चाहिए 'पुरः अर्थात

बड़

भगलछप्रभात

शरौर भें जो रहे वह पुरुष | ऐसा अथ करने से पुरुषा्थ शब्द स्री-पुरुप दोनों के लिए व्यच-' हार किया जा सकता है | जो तीनों काल में संपूर्ण रूप से महात्रतों का पालन करने में समर्थ है, उसे इस जगत में कुछ भी करने को नहीं रहा, वह भगवान्‌ है, वह मुक्त है। हम लोग तो अल्प मुमुज्तु, जिज्ञामु, सत्य का आग्रह रखनेवाले उसको खोज करनेवाले प्राणी हैं इसलिए गीता की भाषा में, धीरे-धीरे क्रिन्तु अतन्द्रित रहकर उद्योग करते रहना चाहिए | ऐसा करते-करते क्रिसी दिन प्रभु के प्रसाद के योग्य हो जायेंगे ओर तव हमारे समस्त रस भस्म हो जायँगे।

यदि हमने अस्वाद त्रत का महत्व समझ लिया हो, तो हमें उसके पालन के लिए नया प्रयत्न करना चाहिए इसके लिए चोबीसों घस्टे खाने के ही वारे में सोचते रहते की जरू-

१८

अस्थाद

रत नहीं होती, सिफे सावधानी की, जाग्रति को परम आवश्यकता रहती है ऐसे करने से कुछ ही दिनों में हमें यह मालूम हो जायगा कि हम कब खाद के फेर में पड़ जाते हैं ओर कब शरीर-पीपण के लिए खाते हैं। यह मालुम दो जाने पर हमें दृइता पूर्वक खादों को घटाते दी जाना चाहिए | इस दृष्टि से विचार करने पर शामिल रसोई जो अखाद वृत्ति से बनती ही, वहुत सहायक है| वहाँ रोज इसका विचार नहीं करना पड़ता, कि आज हम क्या खायँगे था क्या पकायेंगे। जो बना हो ओर जो अपने लिए त्याज्य हो उसे इश्वर का अनुप्रह मानकर, मन में भी उसके भले-बुरे होने की आलोचना ने कर, सन्तोपपृवेंक शरीर के लिए जितना आवश्यक हो, उतना खा लेना चाहिए। ऐसा करनेबाला अनायास अस्थाद त्रत का पालन करता है।. संयुक्त रसाइ चनानेवाले हमारा २९

मंगलप्रभात

भार हलका करते हैं | हमारे व्रत के थे रक्षक बनते हैं।स्वाद की दृष्टि से वे कुछ भी बनायें, केंचल समाज के शरीर का पोषण करने के लिए ही रसोइ बनावेंगे। वारतव में आदश्श अवस्था में अम्ति की आवश्यकता कम से कम्म या चिलकुल ही नहीं है। सूय रूपी महाअप्नि जिन चीजों को पकाती है, उन्हीं में से हमारे खाद्य का चुनाव होना चाहिए | श्रोर इस प्रकार के विचार से सिद्ध होता है कि मनुष्य प्राणी केवल फल्नाहारी है; परन्‍्तु यहाँ इतने गहर में उत्तरंन की जरूरत नहीं। यहाँ तो केवल इसी बात पर विचार करना है कि अस्वाद व्रत क्‍या है, उस में कोन-कोन सी कठिनाइयाँ हैं या नहीं हैं और उसका त्रह्मचय पालन के साथ कितना अधिक निकट सम्बन्ध है। इतना समझ में जाने पर सबको यथाशक्ति इस ब्रत के पालन का शुभ प्रयत्न करना चाहिए |

३०

अस्तेय समूजप्रभात १९-०८०३० अझच हम अस्तेयम्नत पर आते है गम्भी- रता पूवक विचार करने पर हमें मालूम होगा कि सभी ज्रत सत्य ओर अहिंसा अथवा सत्य के ग२ मे स्थित हैं वे इस प्रकार दिखाये जा

कर. खा

सकते हू --

सत्य सत्य--श्रहिंसा | ग्रथवा | अदिसा

[ ] |_ | ब्रह्मचयं, अस्वाद, अस्तेय, अपरिमप्रह, अभय इत्यदि जितना बढ़ायें उतना या तो सत्य से अदिसा की उत्पत्ति माननी चाहिए या सत्य ओर अहिंसा का जोड़ा

३१

संज्जल्प्रभात

लें दोनों एक ही वस्तु हैं। फिर भी मेरा मन पहले की ओर भ्ुकता है। ओर अ्रन्तिम अवशखा जोड़े से, इन्द्रस अतीत है। परम सत्य अकेला खड़ा होता है। सत्य साध्य है, अहिंसा साधन है श्रदिंसा क्‍या है यह हम जानते है, पान कठिन है। सत्य कातो अंशमात्र जानते हैं; पूर्ण रूप से जानना देही के लिए कठिन है, जेसे अहिंसा का,पूण पालन देही के लिए कठिन है

अस्तेय का अथ है चोरी करना | ऐसा कोई नहीं कह सकता कि चोरी करनेवात्ना सत्यकों जान सकता है या प्रमघम का पालन कर सकता है। फिर भी चोरी का दोप हम सभी थोड़ा चहुत जाने अनजाने करते हैं। दूसरे की वस्तु विना उसकी आज्ञा के लेना तो चोरी है ही परन्तु अपनी मानी जाने वाली

चीज़ों की भी मनुष्य चोरी करता है :--मैसे ३२

अस्तेय

एक बाप अपने बच्चों के अनजान में, उनसे छिपाने की नीयत से 'गुपचुप कोई चीज़ खा लेता है | यह क॒टद्ठा जा सकता है कि आश्रम का भण्डार हम सभी का है, परन्तु उसमें से जो चुपके से गुड़ की एक कंकड़ी भी लेता है वह चोर हैं एक बालक दसरे की कलम लता वह चोरी करता है। जिसकी वस्तु हो वह सता हों तो भी उसकी ओआज्षञा के चिना उसकी चीज़ लेता भी चोरी है। क्रिसी चीज़ को लावारिस साज्न समझकर ले लेना भी चोरी है। अ्रथात्‌ रास्ते में पड़ी मिली चीज़ के मालिक हम नहों बल्कि उस प्रदेश का राजा या वहाँ की सरकार होती है। आश्रम के पास मिली कोई भी वस्तु आश्रम के मन्‍्त्री को सौंप देनी चाहिए। ओर मन्त्री, यदि वह आश्रम की दो तो पुलिस के हवाले कर दे। हाँ तक समझना तो एक तरद् से सहज 2३

महुलप्रभांत

ही है। परन्तु, अस्तेय इससे बहुत आगे बढ़ जाता है। जिस चीज़ की हमें जरूरत नहीं है, उस जिसके अधिकार में वह: हो उसके पास से उसकी आज्ञा लेकर भी लेना चोरी है। अनावश्यक एक भी वस्तु लेनी चाहिए। ऐसी चोरी संसार में सबसे अधिक खाद्य ' पदार्थों के सम्बन्ध में होती है। मुझे अम्नुक फल की जरूरत नहीं है, फिर भी में उसे लेता हूँ अथवा ज़रूरत से अधिक लेता हूँ, तो यह चोरी हैं | मनुष्यः सदा यह नहीं आनता कि वस्तुत: उसे कितनी जरूरत है. ओर प्रायः हम सभी, जितनी होनी चाहिए, उससे ज्यादा ही अपनी ज़रुरतें बढ़ा लेते हैं। इससे हम अत. आंन में चोर वनते.हैं | विचार करने पर हम देखेंगे कि अपनी बहुतेरी आवश्यकतायें हम घटा सकते हैं। अस्तेय श्रत पालन करनेबात्रा उत्तरोत्तर अपनी आवश्यकतायें घटाता जायगा |

१४

: ज्ञस्तेय

इस संसार में अधिकांश निधनता अस्तेय के भट्ट से उत्पन्न हुई है।

उपरोक्त सभी चोरियों को बाह्य अथवा शारीरिक चोरी समझता चाहिए। इससे सूक्ष्म ओर आत्मा को नीच गिराने या रखनेवाली चोरी मानसिक है प्ेनसे हमने किसीकी वस्तु प्राप्त करने की इच्छा की या उसपर जूटो नज़र डाली तो वह चोरी है। सयाने या वच्चे फोई अच्छी चीज देखकर ललचायें तो वह मानसिक चोरी है। उपयास करने वाला शरीर से तो नहीं खाता, पर दसरों को खाते देखकर मन से खाद का संवन करता है, तो बह चोरी करता है, और अपने उपवास का भंग करता है। जो उपवासी उपचास तोड़ते सन में भोजन के ही मन्‍्सुवे .करता रहता है, कहा जा सकता है कि वह अस्तेय और उप- वास का भट्ठ करता है। अस्तेय व्रत का पाकन

र५

मदर्ंप्रभात

#रनेवाला भविष्य में प्राप्त होनेवाली वस्तुओं के हवाई महल नहीं उठाता रहता। अनेक चोरियों के मूल में यह लालची इच्छा मौजूद दिखाई देगी | आज जो केवल विचारभर में ही है, उसे प्राप्त करने के लिए कल हम भल्ले- बुरे उपायों से काम लेने लग जायेंगे।

ओर जिस तरह वस्तु की चोरी होती है उसी तरह विचार की भी चोरी होती है। कोई खास उत्तम विचार अपन मन में उत्पन्त हुआ हो, तो भी जो अहड्लारयश अपने को उस विचार का प्रथमकर्ता बताता है वह विचार की चोरी करता है। ऐसी चोरी अनेक विद्वानों ने भी संसार के इतिहास में की है और वह अब भी जारी है | मान लीजिए कि मैन आन्ध्र में नये ढड़ का चरखा देखा वैसा चरखा मेंन आश्रम में बनाया ओर फिर कहूँ कि यह तो मैरा आविष्कार हे तो इसमें में स्पष्ट रूप से

३६

अस्तेय दूसरे के आविष्कार की चोरी करता हैँ, अस- त्य का सहारा तो लेता ही हूँ

इसलिए अस्तेय त्रत का पालन करनेवाले को बहुत नम्र, वहुत विचारशील, चहुत्त साव- धान ओर बहुत सादगी से रहना पड़ता है

३७

अपरिग्रह

मंगलप्रभात २६-८०३०

अपरियग्रह अस्तेय से सम्बन्धित समझना चाहिए जो वास्तव में चुराया हुआ नहीं है बह अनावश्यक संग्रह करने से चोरी का सा माल हो जाता है। परिग्रह का श्र है संचय या इकट्ठा करना सत्य-शोधक, अहिंसक परि- अरह नहीं कर सकता | परमात्मा परिग्रह नहीं करता उसे “चाही” वस्तु वह रोज की रोज पैदा करता हैं | इसलिए यदिं हम उस पर विश्वास रखें तो हमें समझना चाहिए कि हमें आवश्यक चीजें वह प्रति दिन देता है, देगा।

३८

अपारअदद

भोलियाओं का, भक्तों का यह अनुभव है| प्रतिदिन की आावश्यक्रता भर ही प्रति दिन उत्पन्न करने के इश्वरीय नियस को हम नहीं जानते, अथवा जानते हुए भी पालते नहीं हैं इससे संसार में विपमता ओर उससे उत्पन्न होनेवाले हु:खों का अनुभव करते हैं। घनियों के थहाँ कितनो ही चीजें जिनकी उनको जरूर रत नहीं होती भरी रहती हैं, मारी मारो फिरती हैं, खराब हो जाती हैं, जब कि उनके अभाशओं में करोड़ों मनुष्य भटकते फिरते हैं, भूखों मरते हैं, जाड़े से ठिठुरते हैं। सब लोग अपनी आव- श्यकता भर दी संग्रह करे, तो किसीको तक्ी पड़े ओर सबको सन्‍्तोपष रहे | आज तो दोनों तक्ी अलुभव करते हैं करोड़पति अर- चपति होन की चेष्टा करता हैं, फिर भी उसे सनन्‍्तोप नहीं रहता कट्ठाल करोड़पति होना चाहता है; द्रिद्र को केवल पेट भरने भर को

३५९.

मडहछप्रभात॑

ही मिलने से सनन्‍्तोप होता दिलाई नहीं देता परन्तु दरिद्र को अपने पेट भर पाने का अधि- कार है, और उसे उतना प्राप्त करा देना समाज का धर्म है। इसलिए उसके ओर अपने सन्तोष के लिए घनी को अगुआ होना चाहिए। वह अपने अत्यन्त परिग्रह का त्याग करे तो दरिद्र को उसकी अवश्वकता भर आसानी से मित्र जाय ओर दोनों पत्त सन्‍्तोष का सबक सीखें। आदर्श आत्यन्तिक अपरिग्र तो उसीका होगा जो मन से और कर से दिगम्वर है। मतलब, वह पक्ती की भांति विना घर के, विना वस्धों के और बिना अन्न के विचरण करेगा। अन्न तो उसे प्रति दिन चाहिए सो भगवान्‌ देता रहेगा। इस अवधूत अवस्था को तो विरले ही पहुंच सकते हैं। हम साधारण कोटि के सत्याम्रहियों को, जिज्ञासुजनों को तो आदश को ध्यान में | रखकर नित्य अपने परिप्रह को जाँच करते ७०

हे» व» छान का गण बाहा-- ग्यकाकछ #...० बह. बमन्‍मगकाक

अपरिय्रद

रहना चाहिए और जैसे बने बैसे उप्ते घटाते। रहना चाहिए। सच्चे सुधार का, सच्ची सभ्यता का लक्षण परिग्रह बढ़ाना नहों है, बल्कि उसका विचार ओर इच्छा पूर्वक घटाना है। जयों-ज्यों परिमह धटाइए स्यॉ-त्यों सथ्चा सुख ओर सच्चा सन्तोष बढ़ता है, सेवाशक्ति बढ़ती है।इस

: प्रकार विचार ओर आचरण करने पर हमें सालूस

होगा किहम लोग आश्रम में बहुतसा संग्रह ऐसा करते हैं, कि जिसकी आवश्यकता सिद्ध नहीं कर सकते ओर ऐसे अनावश्यक परिप्रह से पड़ोसी को चीरी करने के ल्ञालच में फँसाते हैं। अभ्यास से मनुष्य अपनी आवश्यकताओं

. को घटा सकता है; और ज्यों घटाता है, त्यों : बह सुखी, शान्त ओर सब तरह से आरोग्य- : बान होता है। केवल सत्य की, आत्मा की दृष्टि . से विचार करने से तो शरीर भी परिय्रह है

भोगेच्छा से हमने शरीर का आवरण खड़ा घ१

मज्नलप्रसात

किया है और उसे कायम रखते हैं भोगेच्द्रा अत्यन्त ज्ञीण हो जाय तो शरीर की आधब- श्यकृता मिट जाय, मनुष्य को नया शरीर धारण फरने को रह जाय। आत्मा सर्वव्यापक्र है तो शरार रूपी पिंजड़ मे फेस बन्द रह सकता है, इस पिंजड़े को बनाए रखने के लिए अनथ केसे कर सकता है ? दूसरों को केसे मार सकता है! इस प्रकार विचार करते हुए हम आत्य-

तक त्याग के पास पहुँचते हैं और शरोर है. तबत+ उसका उपयोग केचल सवबाके लिए करना सौखते हैं; यहांतक कि उसकी वास्तविक खुराक सवा दी ही जाती है। उसका खाना पीना, लेटना, बेठना, जागना, ऊँघना सब सवा ही के लिए होता है इससे जो सुख उतपन्न होता है, वह वास्तविक सुख है ओर ऐसा करते हुए मनुष्य अन्त में सत्य की भाँक्की करेगा। इसी दृश्य से हम सबको अपने परिग्रह पर विचार

छुर

अपरिग्रह :

कर लेना चाहिए इतना याद रखने योग्य है कि वस्तुश्रों की भाँति विचार का भी अपरिप्रह होना चाहिए। जो मनुष्य अपने दिमारा म॑ निरथ ज्ञान भर लेना है वह परिप्रही हे। जो के हम इश्धर से विमुख- रखते हां, अथवा इंश्वर के प्रति ले जाते हों, वे सभी परिग्रह में जाते हैं ओर इसलिए त्याज्य हैं ज्ञान की ऐसी परिः भाषा भगवान ने गीताके तेरहवें अध्याय में दी है चह यहाँ खयाल में लानी चाहिए। अमानित्व इत्यादि को गिनाकर कह दिया कि उसके बाहर का जो सब है वह अज्ञान है। यह सत्य वचन ही--ओर सत्य है ही, तो श्राज हम बहुत कुछ जो ज्ञान के नाम से बटोरते हैं, चह अज्ञान ही है ओर उससे त्ञाभ के चढ़ले हानि होती है; दिमाग फिर जाता है, अन्त में खाली हो जाता है; असन्तोप फैलता है और अनर्थ ४३,

हैं दि

मन्नेलप्रभांत

पढ़ते हैं | इससे कोई मंदता का अर्थ ने ' निकाले | मत्येक क्षण प्रवृत्तिमय होना चाहिए पर बह प्रवृत्ति सात्त्विक होनी चाहिए, सत्य की ओर लैजानेचाली होनी चाहिए | जिसने सेवा धर्म को स्वीकार किया है, वह एक क्षण भी मन्द रह नहीं सकता | यहाँ तो सारासार का विवेक सीखना है | सेवा परायण को यह चिवेक सहज प्राप्त है

४४

उधर

भंगलप्रभांत २--९--३०

इसकी गणना गीता के सोलहवें अध्याय में देवी सम्पद्‌ का वन करते हुए भगवान ने सबसे पहले की है | यह श्लोक संगतिकी सुचिधा के लिए किया गया है या अभयको प्रथम स्थान मिलना चाहिए इसलिए है, इस विवाद में में नहीं जउतरता; ऐसा निणय करने की मुममें योग्यता भी नहीं है। मेरी समझ में अभय को योंही प्रथम खान सिल गया हो, तो भी चह उसके योग्य ही है अभय विना दूसरी सम्पत्तियाँ नहीं मिल सकती | अभय के बिना सत्य की खोज केसे संभव है ) अभय बिना अहिंसा का पालन कैसे हो सकता है ? 'हरि का मारग है

४५

मजलपभात

शूरों का नहीं वहाँ कायर का काम !सत्य दी हरि है, वही राम है, चही:नारायण है, वही वासुदेव है, कायर माने भयभीत, डरपोक; वीर का अथ है भयमुक्त, ढाल तलवार वांधे नहीं | तलवार श्रता की निशानी नहीं है, भीरुता का चिह्न है। अभय अथांत बाहरी सच भयों से मुक्ति- _

मौत का भय, धन-दोलत लुट जाने का भय, कुटुम्व प्रिवारचिपयक भय, रोग का मय, शस्र- प्रहार का भय, इज्जत आवरू का भय, किसी के धुरा सानने का भय इस प्रकार भय की पीढ़ी जितनी बढ़ाय बढ़ सकती है। साधारणतः यह कहा जाता है कि एक मात्र मृत्यु भय को जीत लिया वो सव भय जीत लिये, परन्तु यह ठीक | जान पड़ता बहुतेरे मौत का भय छोड़ देते हैं, फिर भी अनेक प्रकार के दश्खों से भागते है कोई खुद मरने को तैयार होते हैं पर खजनस्नेहियों का वियोग सहन नहीं कर सकते।

४६

ऊसय

कोई कंजूस यह सब छोड देगा देह छोड़ देगा पर बटोरा हुआ घन छोड़ने में कातर हो जायगा कोई स्थकल्वित मान प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए वहत कुछ सियाह-सफेद करने के लिए तेयार हो जायगा और करेगा संसार की निन्‍्दा के भय से कोई सीधा सांग जानते हुए भी उसे पकड़ते द्िचक्रिचायगा सत्य की खोज्ञ करने वाले का इन समस्त भयों को तिल्ांचलि दिये' ही निस्तार है| हरिश्वन्द्र की भाँति मिट जाने की उसमें तेयारी होनी चाहिए। हरिश्च क्री कथा भले ही कल्पित हो, परन्तु सारे आत्मा्थियों का यह अनुभव है, इसलिए उस कथा का मुल्य किसी भी ऐतिहासिक कथा की अपेत्ता अनन्त गुना अधिक है और हम सबके लिए बह संग्रह तथा मनन करने योग्य है अमभयत्रत का सर्वधा पालन लगभग अशक्य है। भयमात्र से मुक्ति ती, जिसे आत्म-'

९29

मन्नलप्रभात

साक्षात्कार हुआ हो वही पा सकता है। अभय, मोहरहित अवस्था की पराकाष्ठा है। निश्चय करने से, सतत प्रयत्त करने से और आत्मा पर श्रद्धा बढ़ने से अभय की मात्रा बढ सकती है मैंने आरम्भ में ही कहा है, कि हमें बाहरी भरयों से मुक्ति प्राप्त करनी है भीतर जो शत्र मौजूद हैं उनसे तो डरके ही चलना है। काम क्रोधादि का भय चास्तविक भय है | उन्हें जीत लेने से बाह्य भयों का उपद्रव अपने आप मिट जाता है | भय मात्र देह के साथ हैं। देहवि- पयक राग दूर हो जाय तो अभय सहज प्राप्त हो जाय विचार करन पर हमें मालूम होता है कि भय मात्र हमारी कल्पना की सृष्टि है। धन से, परिवार स, शरीर से अपनापन! हटा दें ती फिर भय कहाँ ! 'तेनत्यक्त भुझ्जीथा: |! यह रामबाण वचन है कुटुम्ब, धन, देह जैसे के तेसे रहेंगे केवल इनके सम्बन्ध की अपनी ४८

अभय

कल्पना हमें बदल देनी है। ये 'हमारे' नहीं; ये मर! नहीं; ये इश्वर के है; 'में! भी उसीका हूँ; मरा! कहलानवाली इस संसार में फोड भी बस्तु नहीं फिर मुझे भय किस चात में हो सकता है ? इसीलिए उपनिपद्कार ने कहा है कि “इसका त्याग करके उसे भोग ! अर्थात्‌ हम उसके रच्ुक बनें वह उसकी रक्ता करने भर की ताकत ओर स्रामग्री देदेगा यों स्वामी ने रहकर हम सेबक हो जायें, शूल्यब॒त द्वाकर रहें तो अ्रनायास भवमात्र को जीत लें, अना- थास शान्ति प्राप्त करें सत्यनारायण के दर्शन पाव

अस्पश्यतानिवारण

है

म्रगतप्रभात ९०९५३

यह व्रत भी अखादब्रत की तरह नया है ओर कुछ विचित्र भी ज्गता है। पर जितना विचित्र है, उससे अधिक आवश्यक है। अस्प्र- श्यता माने छुआछूत यह जहां वहाँ धम्म में धर्म के नाम या बहाने से विध्न डालती रहती है ओर धर्म को कल्लुषित करती है | यदि आत्मा एक ही है, ईश्वर एक ही है, तो अछूत कोई नहीं है। जिस प्रकार भनज्ी, चमार अबछूत माने जाते हैं, पर अछूत नहीं हैं, उसी प्रकार मृत शरीर भी अस्पृश्य नहीं है, वह आदर और करुणा का पात्र है। मत देह को रपश करने, तेल्न मलने अथवा हजामत बनाने बनवाने के

५०

जश्पृश्यतानिवारण

बाद श्रगर हम नहाते हैं तो वह सिफ़ स्वास्थ्य की दृष्टि से | सत देहकों स्पशंकर या तेल लगा- कर जो नहाये वह गन्दा भले ही कहा जाय पर वह पातकी नहीं है, पापी नहीं है यों तो बच्चे का सेला उठाकर साता जब तक नहाये या हाथ पेर धोये तवतक भले ही अम्पृश्य हो पर बच्चा यदि खेलते-खेलते उसे छूले तो वह छुवा नहीं जाता, उसका आत्मा मलिन होता। परन्तु जो तिरस्कार भावस भट्गी, चमार आदि नामों से पुकारा ज्ञाता है वह तो जन्म सेद्दी अछूत माना जाता है। उसने भले ही मनों सावुन बरसों तक शरीर पर घिसा हो, भले ही वह बेष्णच कासा पहनावा रखता हो, भले ही माला कण्णी घारण करता हां, भले ही नित्य गीता पाठ करता हो ओर भले ही लेंखक का व्यवसाय करता हो फिर भी अछूत ही है। ऐसा जो धस माना या वरता जाता है वह वस

५१

मजलगप्भात

नहीं, अबम है ओर नाश के योग्य है। हम क्रतों में अस्प्ृश्यवानिवारण को खान देकर ऐसा मानते हैं कि अस्पृश्यता-छुआछूत हि

धर्म का अड्ज नहीं है, वल्कि उसमें घुसी हुई सड़न है, वहस है, पाप है और उसका निवा- रण करना प्रत्येक हिन्दू का घम है, परम कतव्य है। इसलिए जो उसे पाप मानते है उन्हें चाहिए कि उसका प्रायश्रित्त करें, और कुछ नहीं तो आयश्रित्त हूप से भी धर्म समझ कर सममभदार हिन्दू प्रत्यक्त अछूत माने जाने वाले भाई-बहन को अपनायें प्रेम पूर्वक सेवाभाव से उसे स्पशे करे', स्पर्श करके अपने को पवित्र हुआ समझे, अछूत के द:ख दर कर | बरसों से वह कुचला गया है, इसलिए उसमें जो अ्ज्ञानादि दोष आगय हें, उन्हें दर करने में घेयपूवक उसे सहायता दे' और दूसरे हिन्दुओं को भी ऐसा ही करने के लिए राजी

ण््‌

अस्पश्यतानिवारण

फरें, प्रेरित करें। अरप्रृश्यता को देखते हुए उसे दूर करने में जो ऐेहिक या राजनैतिक परिणाम हैं, उन्हें ऋतथारी तुच्छ गिनेगा। ध्या वैसे परिणाम प्राप्त हों या नहों, फिर भी अस्पृश्यतानिवारण का नतरूप से आच- रण करनेवाला श्रद्धृत गिने ज्ञानेबालों को घम ससमभकर अपनायेगा। सत्यादि का आचरण करते समय हमें ऐहिक फल्न का विचार करना चाहिए। सत्याचरण व्रतघधारी के लिए एक युक्ति नहीं है, वह तो उसके शरीर से जुड़ी हुई वस्तु है, उसका खभाव हैं; अस्पृश्यता निवारण भी उस त्रतवारी के लिए ऐसा ही हैं। इस अस्पृूश्यता का महत्व समम में आा जान पर द्में मालूम होगा कि यह सड़न केवल भंगी, चमार कहे जानेवाले लोगों के ही विषय में घुस गई हो, सी बात नहीं हैं। सइन का. स्वभाव है. कि बह पहले राई के वरावर दिखाई ५प्

'मट्गल प्रभात

देती हैं, पीछे पवेत का रूप घारण कर लेती ' है और अन्त में जिसे लगती है, उसका नाश : करती रहती हैं। छूआछूत के सम्बन्ध में भी यही बात है। यह छूआछूत विधर्मियों के प्रति दिखाई देती है, अन्य सम्प्रदायों के प्रति दिखाई देती है, एक ही सम्प्रदायवालों के वीच भी घुसगई है। यहाँ तक कि कुछ लोग तो छूआ- छूव का पालन करते-करते प्रथ्वी पर भार रूप हो गए हैं वे अपने को दी सम्हालने, अपने को ही पोसने-पालने, नहाने-घोने, खाने-पीने से फुर्सत ही नहीं पाते, इधर के नास पर इंश्वर को भूलकर वे अपने को ही पूजने लग गए हैं। इसलिए अस्पृश्यतानिवारण करनलेवाला भंगी, चसार को अपनाकर ही सनन्‍्तोष मान लेगा; वह जब तक जीवमात्र को अपने में देखले और अपनेको जीवमात्र में होम दे, तब तक शान्त होने का नहीं अस्पृश्यता दूर करने

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अस्पृध्यतानिवारण

का अथ हैं समस्त संसार के साथ मित्रता रखना, उसका सेवक बनना। इस दृष्टि से देखने पर अस्ृश्यतानिवारण अहिसा का जोड़ा बन जाता है और वस्तुतः बह है ही अदिंसा के मानी हैं जीवसात्र के प्रति पूर्ण म्ेम | अस्पृश्य- तानिवारण का भी यही अथे है। जीवमात्र के साथ का भेद मिटाना अस्परश्यतानिवारण है यो अस्पृश्यता को देखने पर यह दोप जरूर ही थोड़े बहुत अंशों में संसार भर में फेला हुआ है। पर यहाँ हमने उस पर हिन्दू धर्म में समाई हुई सड़न के रूप में विचार किया है क्योंकि हिन्दू घर्म में उसने थम का स्थान ले रक्‍्खा है और धर्म के बहाने लाखों था करोड़ों मनुष्यों की अवस्था गुलामों जैसी बनादी है।

प्‌प्‌

कायिकपरिप्रम महलमप्रभाते ६-९०३०

कायिकपरिश्रंम मंतुष्य मात्र के लिए अनिवाय है यह वात पहले-पहल मुमे टालस्टाय का एक निवनन्‍्ध पढ़कर हृद््यंगम हुईं | इतनी स्पष्ट रूप से इस बात को जानने के पहले उस- पर में अमल तो करने लगा था--रस्किन का अन्दर दिस लास्ट” पढ़ने के बाद फोरन ही कायिकपरिश्रम अंग्रेजी शब्द 'ब्रेडलेबर का अनु बाद है | त्रेडलेबर” का शब्दशः अनुवाद होता है सेटी (के लिए ) परिश्रम। रोटी के लिए प्रत्येक मनुष्य की मंजूरी करनी चाहिए, हाथ पैर हिलाने चाहिए, यह इश्वरी नियम है। यह मृल्त खोज टालस्टाय॑ की नहीं है, पर उसकी

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कायिकपरिश्रम

भ्रपेत्ञा बहुत अपरिचित रूसी लेखक घुननोंद्ठ की है। उसे टालस्टाय ने शोहरत देकर अपनाया | इसकी फाँकी मेरी आँखें भगवदगीता के तीसरे अध्याय में कर रही हैं | यज्ञ किय बिना जो खाता है वह चोरी का अन्न खाता है। अयकज्ञ के लिए यह कठिन शाप है | यहाँ यज्ञ का अथ कायिकपरिश्रम या 'रोटी परिश्रम” ही शोभा देता है ओर मेरे मतानुसार निकलता भी है। चाहे जो हो, यह हमारे इस न्नत की उत्पत्ति है। चुद्धि भी इस वस्तु की ओर हमें लें जाती है। जो मजूरी करे उसे खान का क्या अधिकार हो सकता है ? बाइवल का कथन है, कि अपनी रोटी तू अपना पसीना बहाकर कमाना और खाना / करोड़पति भी यदि अपन पलड़ पर पड़ा रहे और उसके मुँह में कोई . खाना डाले तब वह खाय, तो वह बहुत दिनों; तक खा सकेगा, उसमें उसके लिए आनन्द 4]

मकल्प्रभात

भी रह जायगा। इसलिए वह व्यायामादि करके भूख उत्पन्न करता है और खाता तो है अपने ही हाथ-मुंह हिलाकर। ऐसी अ्रवस्था में यह प्रशत आप से आप उठता है कवि यदि इस वरह किसी क्रिसी रूप में राजा रंक सभी को शारीरिक व्यायाम करना ही पड़ता है तो रोटी पेदा करने की ही कसरत सब लोग क्यों करें ? किसान से हवा खाने या कसरत करने को कोई नहीं कहता और संसार के सेकड़े नब्बे से भी अधिक मनुष्यों का निर्वाह खेती से होता है। शेष दस प्रतिशत मनुष्य इनका अनुकरण करें तो संसार में कितने सुख, कितनी शान्ति ओर कितने स्वास्थ्य का प्रसार हो सकता है ! ओर खेती के साथ बुद्धि का मेल हो जाय, तो खेती के काम की अनेक कठिना- इयाँ आसानी से दूर हो जायेँ इसके सिवा यदि कायिकपरिश्रम के इस निरफवाद मियम

"८

कांयिकपरिभ्रम

को सभी मानने लगें तो ऊँच-नीच का भेद दूर दी जाय | इस समय तो जहाँ उच्चता और नीचता की गन्ध भी थीं, वहाँ भी अर्थात चर्ण|व्यवस्था में भी वह घुस गई है। सालिक मजदूर का भेद सर्वव्यापक हो गया है और ग़रीब-अमीर से इंध्या करता है। यदि सब अपनी रोटी के लिए खुद मिहनत कर तो #ँच!' नीव का भेद दूर हो जाय ओर बाद को जो धनी वर्ग रह जायगा वह अपने को मालिक मानकर उस घन का केवल रक्षक या ट्रस्टी : मानेगा और उसका उपयोग मुख्यतः केवल लोक सेवा के लिए करेगा | जिसे अहिंसा का पालन करना है, सत्य की आराधना करनी है, त्रह्मचये को स्वाभाविक्र बनाना है उसके लिए तो कायिक परिश्रम रामबाण रूप हो जाता है।यह परिश्रम सच पूछिय तो खेती ही है। परल्तु आज तो ऐसी स्थिति है, कि सब उसे नहीं

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सन्जालत् नांते

कर सकते इसलिए खेती का आदशो ध्यान में रखकर, आदमी उसके एवं में दूसरा परि- श्रम जैसे कातना, चुनना, बढ़ईगिरी, लुह्दार का काम इत्यादि करसकता है। सवकी अपना-अपना क्री तो हीना ही चाहिए | शो खाता है, उसे मतत्याग तो करना ही पड़ता है जा' मल्त्याग फरे वही श्रपने मत्न को गाड़े--यह सबसे अच्छी चात है यह हो सके तो समस्त परि: बार अपना कर्तव्य पालन करे | मुझे तो वर्षों रण ऐसा मालूम होता रहा है कि जहाँ भंगी का अलग घन्या माना गया है, वहाँ फोई महादोप घुस गया है। इस आवश्यक आरोग्य रक्षक काय को नीच से नीच पहले किसने माता होगा, इसका इतिहास हमारे पास नहीं है | जिसने ऐसा माना है, उसने हमपर उपकार कदापि नहीं किया है। हम सभी भंगी हैं, यह भावना हम सबों में बचपन से ही ढ़ हो जानी

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कायिकपरिश्रप्त

चाहिए और इसे हृढ़ करने का सहज से सहज उपाय यह हैं कि जो समभझ सके हों, वे आत्म- परिश्रम का आरम्भ पाखाना साफ़ करने से. कर। जो ज्ञानपूवक ऐसा करेगा, वह उसी कण सधम् को अतग ओर सच्चे रूप में सममने लगेगा। बालक, वृद्ध और रोग से अपडहूः बने हुए यदि परिश्रम करें तो उसे कोइ अपवाद माने | वाल्क का समावेश माता में हो जाता है। यदि नियम भंग हो तो बूढ़े अपंज् हॉंगे और रोग तो द्वो दी केस सकता है !

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सर्वधमं समभाव--१

मंगलप्रभात २३०५९०३०

अपने ब्रतों में जिस व्रत को हम लोग सहिष्णुता के नाम से जानते हैं, उसे यह नया (नाम दिया है | सहिष्णुता अंग्रेजी शब्द 'टाल्न- 'रेशन! का अनुवाद है यह मुझे! पसन्द पड़ा था, पर दूसरा शब्द सुभता था। काका साहब को भी यह पसन्द आया था | उन्हों- ने 'सवंधमंआदर” शब्द सुझाया | भुझे यह भी अच्छा लगा ।दूसरे धर्मों को सहन करने में उनमें न्‍्यूतना मान ली जाती है। आदर में कृपा का भाव आता है। अहिंसा हमें दूसरे धर्मो के प्रति समभाव सिखाती है। आदर और सहिष्णुता अ््दिसा की दृष्टि से परयांप्र नहीं हैं

ह्२

थम स्ंधम समभाव-१

दूसरे धर्मा के प्रति समभाव रखने के मृत्र में अपने धम की अपूर्णता का स्वीकार भी आदी जाता है। ओर सत्य की आराधना, अहिंसा की कसोटी यही सिखाती हैं। सम्पूर्ण सत्य यदि हमने देखा होता तो फिर सत्य का आग्रह केसा ?-- तब तो हम परमेश्वर हो गये, क्‍यों कि यह हमारी भावना है कि सत्य ही परमेश्वर है| हम पूण सत्य को नहीं पहचानते, इसीलिए! उसका आग्रह करते हैं इसीसे पुरुपार्थ की! गुख्लाइश है | इसमें अपनी अपृरणता को मान| लेना गया हम अपूर्ण तो हमारे द्वारा कल्पित धर्म भी अ्रपूर्ण, स्वतन्त्र धर्म सम्पूर्ण - है| उसे हमने देखा नदहीं-जिस तरह इश्बर को हमने नहीं देखा | हमारा माना हुआ धम अपूर है ओर उसमें सदा परिवर्तन हुआ करता है

होता रहेगा। ऐसा होने से ही हम उत्तरोत्तर “ऊपर उठ सकते हैं, सत्य की ओआर--इश्वर की

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मडल्प्रभात .

ओर दिन प्रति दिन आगे बढ़ सकते हैं। और यदि मनुष्यकल्पित सभी धर्मोकों अपूर्ण मानतें तो फिर किसी को अँचब्नीच मानने की बात नहीं रह जाती सभी सच्चे हैं, पर सभी अपृण हैं, इसलिए दोष के पात्र हैं समभाव होने पर भी हस उसमें दोष देख सकते हैं। हमें अपने में भी दोष देखने चाहिए। इस दोप के कारण उसका त्याग करें, पर दोष दूर करं। यों समभाव रखें तो दूसरे धर्मों मं जो कुछ भ्राह्य जान पड़े, उसे अपने धरम में स्थान देते संकोच हो, इतना दी नहीं: वेसा करना धरम हो जाय |

सभी धम इंश्वरदत्त हैं, परन्तु वे मनुष्य कल्पित होने के कारण, मनुष्यद्वारा उनका प्रचार होने के.कारण वे अपूर्ण हैं। ईश्वरदत्त घर्म अगम्य है मनुण्य उस भाषामें प्रकट करता है। उसका अथ भी मनुष्य लगाता है | किसका अथ सब्या माना जाय ? सब अपनी-अपनी

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सर्वंचधम समभाव--९

दृष्टि से जबतक वह दृष्टि बनी रहे, तवतक सच्चे हैं परन्तु सभी का कूठा होना भी अस- म्भव नहीं है इसीलिए हमें सब धर्मों के प्रति समभाव रखना चाहिए इससे अपने घम के प्रति उदासीनता नहीं उत्पन्न होती, परन्तु खध- मे-विपयक प्रेम, अन्च प्रेस रहकर ज्ञानमय हो जाता है इससे अधिक सात्त्विक तथा निमत् बनता है | सब धर्मों के प्रति समभाव आने पर ही हमारे दिव्यचक्तु खुल सकते है घ॒र्मान्धता और दिव्य दर्शन में उत्तर दक्षिण जितना अन्तर है | घमज्ञान होने पर अन्तराय मिट जाते हैं ओर समभाव उत्पन्न होता है। इस समभाव करा विक्रास करके हम अपने धरम को अधिक पहचान सकते हैं रे यहाँ धर्म अधम का भेद नहीं मिटता। यहाँ तो उन धर्मों की बात है, जिन्हें हम निर्धा- रित धर्म के रूप में जानते हैं। इन सभी धर्मो ६५

मंगलप्रभात'

के मूल सिद्धान्त एक हो हैं। सभी में सन्त स्री- पुरुष हो गये हैं, आज भी भोजूद हैं | इसलिए धर्मो के प्रति समभाव में ओर धर्मियों--सनुष्यों- के प्रतिवाले समभाव में कुछ अन्तर है मलुष्य- सात्र--दुष्ट और श्रेष्ठ के प्रति, धर्मी और अधर्मी के प्रति समभाव की आवश्यकता है, परन्तु अधम के प्रति कदापि नहीं

तव प्रश्त यह होता है कि बहुत से धर्मों की क्‍या आवश्यकता है? यह हम जानते है कि धर्म अनेक हैं। आत्मा एक है, पर मनुष्य देह अगणित हैं। देह की असंख्यता दूर करने से दूर नहीं हो सकवी। फिर भी भात्मा की एकता को हम जान सकते हैं। धर्म का मूल एक है, जैसे वृक्ष का, परन्तु उसमें पत्त अग- णित हैं।

द्द

सर्वेचर्म रक्त मंगलप्रभात

३००९-०३

यह विपय इतने मद्दत्त्व का है कि इसे यहां कुछ ओर विस्तार से लिखता हूँ। अपना कुछ अनुभव लिख दूं. तो शायद समभाव का अथ अधिक स्पष्ट हो जाय। यहाँ की वरह फिनिक्स में भी नित्य प्राथना होती थी | वहाँ हिन्दू, मुसलमान ओर ईसाई थे। खर्गीय सेठ रुस्तम जी या उनके लड़के अक्सर उपस्थित रहते ही थे सेठ रुस्तमजी को “मने धहालुं वहालुं दादा रामजीमु' नाम” ( मुझे राम नाम ग्रिय है ) बहुत अच्छा लगता था। मुझे याद आता है कि एक बार मगनतात़ या काशी हम सबको गवा रहे थे। सेठ रुस्तमजी

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मद्गलप्रभात

उल्लास मे वोल 52--दादा रामजी” के बदले 'दादा होस्मजद! गाओ |” गवाने ओर गाने वाज्ञों इस सूचना पर तुरन्त इस तरह अमज्ष किया मानों वह विलकुत्न खाभाविक हो ओर इसके बाद से रुस्तमजी जब उपख्ित होते, तब तो अवश्य ही ओर वह होतें तव भी कभी कभी हम लोग वह भजन दादा होरसजद! के नामसे गाते | स्वर्गीय सेठ दाऊदजी का पुत्र हसन तो आश्रम में वबहधा रहता। बह प्राथना में उत्साह पूचक शासिल होता वह खुद बहुत ही मधुर सुर मे 'आगन! के साथ “यह बहार

बाग दुनिया चन्द रोज” गाया करता। वह भजन उसने हम सबको सिखा दिया था और . वह अक्सर प्राथना में गाया जाता था | हमारी यहाँ को प्राथनामाल्ा ( आश्रम भजनावली ) में उस स्थान मिला है, वह सत्यप्रिय हुसेन की स्मृति हैं। उसकी अपंक्ता अधिक तत्परता से

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सर्वधर्म समभाव*र२

सत्य का आचरण करनेवाला नवयुवक मेंन नहीं देखा जोसफ रायपेन आश्रम में अक्सर आते जाते थे बह इंसाई थे। उन्हें 'बेष्णव जन! चाता भजन बहुत अच्छा लगता था। उन्हें संगीत का अच्छा ज्ञान था। उन्होंने बिष्णव जन! के स्थान पर “क्रिश्चियन जन तो तेने कहिये” अलाप दिया | सबने तुरन्त उनका साथ दिया | मेंने देखा कि जोसफ के आनन्द का वारापार रहा |

आत्मसन्तोष के लिए जब में सिन्न-सिन्न घर्मों की पुस्तकें उलट रहा था, तब मेंने ईसाई, इस्लाम, जरथुस्त्र, यहुदी और हिन्दू--इततने धर्मों की पुस्तकों का अपना सन्तोष करलेने भर को परिचय प्राप्त किया था। में कह सकता हूँ कि इस अध्ययन के समय सभी धर्मो के प्रति मेरे मन में समभाव था में यद्द नहीं कहता कि उस समय मुमे यह ज्ञान था। उस समय

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मडुलप्रभात

समभाव शब्द का भी पूरा परिचय होगा। परन्तु उस समय की अपनी स्मृतियों को ताजी करता हूँ तो मुझे याद नहीं आता कि उन धर्मो के सम्बन्ध में टोका-टिप्पणी करने की इच्छा तक हुई हो परन्तु इनकें ग्रल्थों को घमअन्थ मानकर आदर पूर्वक पढ़ता ओर सबमें मूल नैतिक सिद्धान्त एक जैसे ही पाता था। कितनी ही वातें में समझ सकता था। यही वात हिन्दू धर्मग्रन्थों के सम्बन्ध में भी थी। आज भी कितनी ही वातें नहीं समझता | पर अनुभव से देखता हूँ कि जिसे हम नहीं समक सफते वह जरूर ग़ज़त है, ऐसा मानने में जल्दवाज़ी करना भूल है वहुत सी बातें जो पहले समम पड़ती थीं, आज दीपक की तरह दिखाई देती हैं। समभाव का अभ्यास करने से अनेक गुत्यियाँ अपने आप सुलम जाती हैं। और जहाँ हमें दोष हो दिखाई दें वहाँ उसे दरसाने में भी

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८९ सवं धम सम्भाव-९२

जो नम्नता ओर विवेक होता है, इससे किसी को दुःख नहीं होता

एक कठिनाई शायद्‌ रह जाती है। पिछली बार मैंने कहा था कि घर्म-अधर्म का भेद रहता है, और अधम के प्रति समभाव रखने का अभ्यास करना यहाँ उद्देश्य नहीं है| यदि ऐसा हो तो धर्माथर्म का निर्णय करने में दी क्‍या समभाव की श्वखला नहीं टूट जाती ? ऐसा प्रश्न उठ सकता है और यह भी सम्भव है कि ऐसा निर्णय करनेवाला भूल कर बैठे। परन्तु हममें यदि वास्तविक अहिंसा मौजूद रहे तो हम वैरभाव से बच जाते हैं। क्योंकि अधर्म देखने पर भी उस अघम का आचरण करनेवाले के प्रति तो प्रेम भाव ही होगा ओर इससे या तो वह हमारी दृष्टि खीकार क्र लेगा अथवा हमें हमारी भूल दिखावेगा, या दीनों एक दूसरे के मतभेद को सहन करेंगे।

ज्र

मड़लप्रचात

अन्त में विपज्षी अहिंसक हुआ तो वह कठो- रता से काम लगा फिर भी यदि हम अहिंसा के सच्च पुजारी होंगे तो इसमें ज़रा भी सन्देह नहीं कि हमारी मृदुता उसकी कठोरता को दूर कर ही देगी। दूसरे को उसकी भूल के लिए भी हमें पीड़ा नहीं पहुंचानी है, हमें खुद ही कष्ट सहना है। इस खण नियम का जो पालन करता है वह सभी संकटों से वच जाता है

लग्रता

मंग्रलप्रभांत

७*- पृ ७5-०१

इसे ब्नतों में प्रथक्‌ स्थान नहीं मिल्ला ओर मिल भी नहीं सकता। यह अहिंसा का एक ञथ है, अथवा यों कह्विए कि यह उसके अन्त- गंत है परन्तु नम्नता अभ्यास से श्राप्त नहीं होती | वह खमाव सें ही होनी चाहिए | जब आश्रम की नियमावत्नी पहले पहल बनी, तब मैंने मित्रों के पास उसका मसविदा भेजा था सर गुरुदास बेनर्जी ने नम्रता को त्रततों में स्थान देने की सूचना की थी। उस समय भी उसे व्रतों में स्थान देने का मेने बह्दी कारण बतताया था, जो यहाँ, लिख रहा हूँ यद्यपि व्रतों में उसे स्थान नहीं दिया गया, त्थापि वह

मद्गलप्भात

त्रतों की अपेक्ता शायद अधिक आवश्यक है; उन्तके वरावर आवश्यक तो निश्चय ही है। परन्तु नम्रता किसीको अभ्यास से प्राप्त होती नहीं देखी गई। सत्य का अभ्यास हो सकता है, दया का अभ्यास हो सकता है, परन्तु नम्नता के सम्बन्ध में यह कहा जा सकता है, कि उस- का अभ्यास करना दुम्भ का अभ्यास करना है। यहाँ नम्नता का तात्पय डस वस्तु से नहीं है जो वढ़े आदमियों में एक दूसरे के सम्मा- नाथ सिखाई-पढ़ाई जाती है। कोई (बाहर स) दसरे को साष्टॉंग नमस्कार करता हो, फिर भी मन में उसके सम्बन्ध में तिरस्कार भरा हो तो वह्‌ नम्नता नहीं धूतता है। कोई राम नाम जपता हो, माला फेरवा हो, मुनि जैसा वनकर समाज में बैठता हो, पर भीतर खाथ्थ भरा हो तो वह नम्न नहीं पाखण्ड है नम्न मनुष्य खुद नहीं जानता कि कब वह नम्न रहता है।

ज्टे

नन्नता

सत्यादि की नाप तोल हम कर सकते हें, पर नम्नता की नहीं की जा सकती | खाभाविक नम्नता छिपी नहीं रहती | फिर भी नम्र मनुष्य खुद उसे नहीं देख सकता वशिष्ठ और विश्वा- मित्र का उदाहरण तो आश्रस में हम लोगों ने अनेकवार सुना ओर सममा है हमारी नम्नता शूल्यता तक पहुच जानी चाहिए | हम भी कुछ हैं, यह भूत सिर पर सवार हुआ कि नम्रता हवा हो गई ओर हमारे सभी ब्रत मिट्टी में मिल गए | त्रतव पालन करनेवाला यदि मन में अपने ब्रत-पालन का अभिमान करता है तो त्रतों का मुल्य नष्ट हो जावा है ओर समाज में वे विप रूप हो जाते हैं। उसके त्रत का मूल्थ समाज में ही रह जाता है, वह खुद ही उसका फल भोग सकता है नम्रता का अथ है अहमभाव का आत्यन्तिक क्षय | विचार करने पर मालूम हो सकता है कि इस संसार में ७५

मदलप्रभात॑

प्राणि सात्र का सदल्व एक्र अंग जितना भी नहीं है | शरीर के रूप में हम लोग क्षण जीवी हैं। काल के अनन्त चक्र में सो वर्ष का हिंसाव किया ही नहीं ज्ञा सक्रता। परन्तु यदि हस इस चक्कर से वाहर हो जायँं--अथांत्‌ “कुछ नहीं हो जाय”, तो हम सब कुछ हो जायें। अपने को कुछ मानने का अधथ है हेश्वर पे-- परमात्मा से, सत्य से पृथक हो जाना। कुछ का मिट जाना परमात्मा में मल जाना है। समुद्र में रहनेवाला घिन्दु समुद्र की महत्ता का उपभोग करता है। परन्तु उसका उसे ज्ञान नहीं होता | समुद्र से अलग होकर, ज्यों ही उसने कुछ होने का दावा किया कि सूखा इस जीवन को पानी के बुलबुले की उपमा दी गई है इसमें मुझे ज़रा भी अत्युक्ति नहीं दिखाई देती

ऐसी नम्रता शून्यता का अभ्यास करने

७६

नश्नता

से कैसे प्राप्त हो सकती है ? पर ब्रतों को ठीक से समझ लेने पर नमश्नता अपने आप आने लगती है | सत्य का पालन करने की इच्छा रखनेवाला अहद्भारी कैसे हो सकता है दूसः रोंके त्षिए प्राण न्‍्योद्ावर करनेबाला अपना, स्थान कहाँ घेरने जाय ? वह तो जिस समय प्राण न्‍्योद्वावर, करने का निश्चय करता है, उसी समय अपने शरीर को फेंक देता है। क्या ऐसी नम्रता पुरुषाथरहिंतता नहों कही जा सकती ! हिन्द घम में ऐसा अथ अवश्य कर डाला गया है, ओर इससे आतस्य को, पा

खण्ड को बहुत जगह स्थान भिल्ल गया है वास्तव में नम्नता का अथ है. वीज्रतम पुरुषाथ परन्तु वह सब परमार्थ के लिए होना चाहिए ईश्वर खद चोबीरूों धण्टे अनवरत काम किया करता है, अ्रज्गड़ाईं लनेतक की फरसदब नहीं लेता हम उसके हो जायें, उसमे मित्र जाये,

ु्ख

भ्रज्नलप्रभात॑

तो हमारा उद्योग भी उसके समान ही अत- न्द्रित दो गया-हो जाना चाहिए। समद्र से अलग हो जानेवाले बिन्दु के लिए हम आराम की कल्पना फर सकते हैं, परन्तु समुद्र में रहने वाले बिन्दु के लिए आराम कैसा ! समुद्र को एक क्षण के लिए भी आराम कहाँ मिलता है ? ठीक यही वात हमार सम्बन्ध में भी है। ईश्वररूपी समुद्र में हम मिले ओर हमारा आराम गया। आराम की आवश्यकता भी जाती रही ) यही सच्चा आराम है, यह महाअशान्ति में शान्ति है इसलिए सच्ची नम्नता हमसे प्राणि मात्र की सेवा के लिए सर्वापंण की आशा रखती है सबसे निवृत्त हो जाने पर हमारे पास रविवार रह जाता है, शुक्रवार, सोमवार इस अवस्था का वर्णन करना कठिन है, परन्तु वह अनुभव की जा सकती है। जिन्होंने सर्वापंण किया है, उन्होंने इसका अनु- ७८

नम्नता

भव किया है | हम सब भी अनभव करसकते हैं| यह अनुभव करने के उद्ेश ही हम लोग आश्रम से एकत्र हुए हैं। सभी ब्रत, सभी प्रव॒- त्तियाँ यह अनुभव करने के लिए ही हैं अन्या- न्‍य काय करते हुए किसी- दिन यह हमारे हाथ लग जायगा | यदि केवल उसकी खोज की जाय, तो यह,प्राप्य नहीं है |

स्वदेशो

प्रवचनों में 'स्वदेशी! पर लिखने का विचार त्याग ही दंगा, क्‍योंकि राजनेतिक विपयों को छोड़ने का जो संकल्प किया है उसमें इससे वाधा पड़ती है स्वदेशी पर केवल धार्मिक दृष्टि से लिखते हुए भी झुछ ऐसी वातें लिखनी दी होंगी, जिनका राजनेंतिक विपयों से परोक्त सम्बन्ध है

८०

स्वदेशी ब्रत

खदेशी त्रत इस युग का महात्रत है जो वस्तु आत्मा का धम है, लेकिन अज्ञान या दूसरे कारण से आत्मा को जिसका भान नहीं रहा उसके पालन के लिए ब॒त लेनेकी जरूरत पड़ती है। जो सभावतः निरामिषाहारी है उसे आमि पाहार करने का न्रत नहीं लेना रहवा। आ- मिष उसके लिए प्रलोभन की चीज नहीं होनी . डल्टे आमिष देख कर उसे उल्टी आती है

खदेशी आत्मा का ध॒म है, पर बह

दिसर गया है, इससे उसके विषय में अत लेने की जरूरत पड़ती है। आत्मा के लिए कर | ७५ च्धों कर खदेशी का अन्तिम अथ सारे स्थूत्न सम्बच्धों से

द्‌

मट्नलप्रभात

आत्यन्तिक मुक्ति है ! देह भी उसके लिए पर- दशी है। क्योंकि देह अन्य आत्माओं के साथ एकता झ्वापित करने में घाधक होता है, उसके मांग में विध्नरूप है। जीव मात्र के साथ ऐक्य साधते हुए खद्दशी घरस्स को जानने ओर पालने वाला देह का भी त्याग करता है।

यह अथ सत्य हो तो हम आसानी से समभ सकते है कि अपने पास-पड़ोस की सेवा में ओत-ओत् हुए रहना खद्ेशी धरम है। ऐसी सेवा करते दरवाले वाक्री रह जाते है अथवा उनको हानि होती है, ऐसा आभमासित होने सम्भव है, पर वह आभास मात्र होगा। स्वदेशी की जुद्ध सेवा करने में परदेशी की भी गुद्ध सेवा हो ही जाती है जैसा पिंडमें वैसा ब्रह्मांड में इसके विरुद्ध दर की सेवा करने का सोह रखने में वह तो होती नहीं ओर पड़ोसी की

८ब्‌

स्वरेशीव्रत

सेवा छुट जाती है। यों इधर के रह उधर के ही, दोनों बिगड़ते हैं। मुझ पर आधार रखने वाले कुटुम्बीनन और आमवासियों को मैंने छोड़ दिया तो मुझपर उनका जो आधार थावह चलागया दूरवांलों की सेवा करने जाने में उनकी सेवा करने का जिसका धर्म है बह उसे भूलता है वहां का वात्तावरण विगाड़ा ओर अपना तो विगाड़ कर चला ही था। ऐसे अनगिनत हिसाब सामने रख कर स्वदेशी धर्म सिद्ध किया जा सकता है। इसीस 'स्वघमें निमन॑ श्रेय: परधर्मों भयावह: वाक्य की उत्पत्ति हुई है। इसका अर्थ यों किया जाय तो ठीक होगा कि 'सवदेशी पाल्ते हुए मौत भी हो तो अच्छी, परदेशी तो भयानक्त ही है।” सवघम अर्थात्‌ खदेशी खदेशी सममभेने में ही गड़बड़ होती है | कुटुम्ब पर मोह रख कर में उसे पोसूं, ८३

महलगप्रभात

उसके लिए घन चुराऊं, यह खदेशी नहीं है मुझे तो उनके ग्रति मेरा जो घम्म हे उसे पालना है। उस घमं की खोज करते ओर पालते हुए मुझे सब व्यापी घम मिल रहता है | खघम के पालन से परघर्मी को या परघम को कभी हानि पहुंच ही नहीं सकती, पहुं- चनी चाहिए पहुंचे तो माना हुआ घम खबम नहीं वल्कि वह खामिसान है इससे वह त्याज्य है

खदेशी का पालन करते हुए कुटुम्व का बलिदान भी देना पड़ता है। पर बेसा करना पढ़ें तो उसमें भी कुटुम्ब की संबा होनी चाहिए। यह सम्भव है कि जैसे अपने को खोकर अपनी रक्का कर सकते है वैसे कुटुम्ब को खोकर कुट्ठम्व की रक्षा कर सकते हैं। आनिए, मेरे गाँव में महासारी हो गई। इस

छसदेशीघ्रत

घीमारी के चह्जुल में फंसे हुओं की सेवा में में अपने को, पत्नी को, पुत्रों को, पुत्रियां को ल्गाऊँ और सब इस रोग में फंस कर मौत के मंह में चले जाय॑ तो मेंने कुदुम्ब का संहार नहीं किया, भेंने उसकी सेवा की है। खदेशी में घाथ नहीं है अथवा है तो वह शुद्ध खार्थ है। शुद्ध खाथे माने परमाथ; शुद्ध खदेशी माने परमाथ की पराकाष्टा ;

इस विचार धारा के अनुसार मेंने खादी में सामाजिक शुद्ध खदेशी धर्म देखा। सब को समझ में आने योग्य, सभी को जिसके पालने की भारी आवश्यकता हो ऐसा इस युग में इस देश में कोन खद्देशी धर्म हो सकता है ! जिसके अनायास पालन से भी हिच्दरस्थान के करोड़ों की रक्षा हो सकती है ऐसा कौनसा खदेशी घम हो सकता है ? जवाब में चर्खा अथवा खादी मिली

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मगलमभात्त

कोई यह ते मान कि इस धर्म के पालन से परदेशी मिलवालों को नुकसाम होता है। चोर को चुराई हुई चीज़ वापस देनी पढ़े या वह चोरी करते रोका जाय तो उसमें उसे नुकसान नहीं है, फ़ायदा है। पढ़ोसी शराव पीना या अफीम खाना छोड़ दे तो इससे कल- बार को या अफोम की दृकानदार को नुक- सान नहीं, लाभ है। वे बाजवी तरह से जो अथ साधते हों उनके इस अनथ का नांश होने में उनको ओर जगत को फायदा ही है |

पर जो चर्खे द्वारा जेसे तैसे सत कात कर, खादी पहन पहना कर खदेशी घम का पूर्ण पालन हुआ मान बेठते हैं वे महामोह में डूबे हुए हैं। खादी यह सामाजिक स्वदेशी की पहली सीढ़ी है, इस स्वदेशी घमं की परिसीमा नहीं है ऐसे खादीधारी देख गये हैं, जो और

८६

स्वदेशीनत

सच सामान परदेशी रखते हैं। वे स्वदेशी का पालन करनेवाले नहीं कहे जा सकते वे तो प्रवाह में बहनवाले हें.। स्वदेशी त्रव का पालन करनेवाला बराबर अपने आस पास निरीक्षण करेगा ओर जहाँ जहाँ पड़ोसी की सेवा की जा सकती है अर्थात्‌ जहाँ जहाँ उनके हाथ का तैयार किया हुआ आवश्यक मात होगा वहां वह दूसरा छोड़कर वह लेगा। फिर चाहे सखद्देशी वस्तु पहले महंगी और कमदर्ज की हो | व्रत घारो इसे सुधारने और सुधरवाने का प्रयत्न करेंगा। कायर वनकर खदेशी खराघ है इससे परदेशी काम में नहीं लाने लग जायगा

किन्तु खदेशी धर्म जाननेवात्ता अपने कूये

में डवेगा नहीं | जो वस्तु खदेश में नहीं बनती

आथवा महा कष्ट से ही वन सकती है वह पर

देश के ठप के कारण अपने देश में बनाने बेठ |

म्गद्वग्रभात॑

जाय तो उसमें खदेशी घर्म नहीं है | खरेशी घम पालने वाला कभी परदेश का हेष करेगा ही नहीं। अतः पूर्ण खदेशी में किसी का ठेष नहीं है। यह संकुचित घम नहीं है यह प्रेस

में से अहिंसा में से पेदा हुआ सुन्दर धप है।

ब्रेंत की आंक्‍श्येंक्ता

मंगलप्रभात॑ १४०१०५३०

ब्रेंत के महत्व के सम्बन्ध में में इस लेख- मात्रा में जहाँ तहाँ कुछ कुछ लिख॑ गया हों ऊँगा। पंरन्तु ब्रत जीवन के गंठंन के लिये कितने आंवश्यक हैं, इस पर विचार कर लेना उचित मप्रवीत होंता है ब्रतों के सम्बन्ध में लिख चुका हूँ, इसलिंएं अब॑ हम उंनवुदों की आवश्यकता पर विचार करें।

एक सम्प्रदाय है ओर वंहं प्रबल है, जो कहता है कि “अमुक निथमों का पालन करनां ८९,

मद्लप्रभांत्त

उचित है, पर उनके सम्बन्ध में बुत्त लेने की आवश्यकता नहीं | यही नहीं; ऐसा करना मन की दुवलता सूचित करता है ओर द्वानिकारक भी हो सकता है। फिर, बुत लेने के वाद वह नियम अड़चन करने वाला या पापन्‍्हप मालूम हो तो भी उसे पकड़ रखना पढ़े, यह तो असह्य हैं ।” वे कहते हैं-- उदाहरण के लिये शराब पीना अच्छा है, इसलिए उसे पीना चाहिए, पर किसी समय पी ली जाय तो क्ष्या हानि है? ओपधिह्प से तो उसे पीना ही चाहिये इसलिये उसे पीनेका वत लेना अपने हाथ पर कटा देने के समान है। जो बात दशराव के सम्बन्ध है, वही वात दसरी बातों के सस्वन्ध में भी हैं। झूठ भी भलाई के लिये क्यों बोला जाय ? मुझे इन दलीलों में तत्व नहीं दिखाई देता। वत का अथ है अटल निश्चय अड्चरनों को पार कर जाने के लिये

९८०

अत की आवश्यकता

ही तो ब॒तों की आवश्यकता है | असुविधा सहन करने पर भी जो भद्ग हो, वही अटल निश्चय कहा जा सकता है। समस्त संसार का अनुभव इस वात की गवाही दे रहा है कि ऐसे निम्धय के विना मनुष्य उत्तरोत्तर ऊपर उठ ही नहीं सकता जो पापरूप हो उसका निश्चय बुत नहीं कहलाता धह तो राक्षसी वृत्ति है। ओर क्रोई विशेष निश्चय जो पहले पुण्यरूप प्रतीत हुआ हो ओर अन्त में पापरूप सिद्ध हो, तो उसे त्याग करने का घर्म अवश्य प्राप्त होता है ! परन्तु ऐसी वात के लिये कोई बुत नहीं लेता, लेना चाहिए भी नहीं जो स्बमान्य धर्म माना गया है, मर जिसके आचरण की हमें आदत नहीं पड़ी, उसी के सम्बन्ध में बुत होना चाहिए। ऊपर के दृष्टान्त में तो पापका आभासमात्र सम्भव है सत्यवादी ऐसा विचार करने नहीं वैठता कि सत्य कहने से किसी को हानि

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मंड्ेलप्रस॑ते

म॑ होगी ? उसे खुद ऐसा विश्वास रखना चाहिये कि सत्य से इस संसार में किसी की हानि नहीं होवी ओर हो सकती भी नहीं | मद्यंपान के विषय में भी यही वात है। या तो इस त्रत . पें दवा के लिए अपचांद रहने देना चाहिए, या थ्रत लेने के बाद शरीर के लिए जोखिम लैने का भी निश्चय रहना चाहिएं। दवा के तोर पर भी शराव पीने से शरीर रहे तो क्या हुआ ! शराब पीने से शरीर रहेगा ही, इसका जिम्मा कोन ले सकता है? ओर उस समय शरीर घच गया, पर किसी दूसरे समय किसी दूसरे कारण से वह रहा, तो उसकी जबाब देही किसके सिर रहेगी ? इसके विपरीत, शरीर रक्ता के लिये भो शराब पीने के हँड्टान्त का चमत्कारिक प्रभाव शंराब की लत में फंसे हुए लोगों पर पड़े, तो संसार का कितना लाभ है ! शरीर जाय या रहे, मुझे तो धम को पालन

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व्रत की भावदयकता

करना ही है-ऐसा भव्य निश्चय करनेवाले ही किसी समय इंश्वर की भांक्री कर सकते हैं त्रत लेना दुर्वेज़्तासूचक नहीं, वल्ञसूचक है अमुक वात करनी उचित है तो फिर करनी ही होगी--इसी ( निश्चय ) का नाम ज्रत है और इसमें बल है। यदि इसे त्रत कह कर किसी दूसरे नामसे पुकारिये तो उसमें आपत्ति नहीं हो सकती। परन्तु जहाँ तक हो सकेगा करूँगा ऐसा कहने वाला अपनी कमजोरी या अभि- मान का परिचय देता है, वह खुद भले ही उसे नम्रता के नाम से पुकारता ही। इसमें नसता की गन्धतक नहीं है | मेन तो अपने और बहुतों के जीवन में देखा है कि “यथा सम्भव” शब्द शुभ निश्चयों में विषके समान है। “जहां तक हो सकेगा” वहां तक करनेके मानी हैं पहली ही अड़चन के सामने गिर पड़ना | “जहांतक हो सकेगा सत्य का पाज़न करूँगा” इस वाक्य का

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मज्नलप्रभांत

कोई अथ्थ ही नहों है | व्यापार में यथासंभव अम्नक तारीख़ की अमुक रकम चुकादी जायगी इस तरह की चिट्ठी चेक या हुंडी के रूपये खी कार नहीं की जाती | उसी तरह जहां तक हो सकेगा वहाँ तक सत्य पालनकरनेवाले की हुडी भगवान की दृकान में भुनाइ जा सकगी ईश्वर खुद निश्चय की, त्रत की सम्पूर मूत्ति है | उसके नियम से अग्ु भी इधर उधरहो जाय तो उसका इंश्वर्वही मिट जाय सूय महावत- धारी है, उससे संसार का काल निर्माण द्वोता है और शुद्ध पद्चांगों की रचना की जा सकती है उसने अपनी यह साख धबना ली है कि वह सदा उदय हुआ है ओर होता रहेगा, ओर इसी से हमलोग अपने को सुरक्षित मानते हैं। सभी प्रकार के व्यापार काआधार एक पक्की प्रतिज्ञा होती है। व्यापारी एक दूसरे के प्रति वादे से बंधे नहों तो व्यापार ही चले इस प्रकार ९४

ब्रत की आवश्यकता

बत सर्वव्यापक वस्तु दिखाई देती है। तो फिर जहां अपने जीवन को बांधने का प्रश्न उपस्थिव हो, जहां इंशच्वर दर्शन का प्रश्न हो, वहाँ वुत्त के बिना केसे चलन सकता है ! इसलिए बुत की आवश्यकता के विषय में हमारे मनमें कभी शंका उठनी दी चाहिए [

परिशिष्ठ

[ ब॒त विचार के अभ्यासी के लिए उपयोगी समझ कर आश्रम की नियसावल्ी में से नीचें का साय दिया गया है |

१--ल त्य

साधारण व्यवहार में असत्य बोलना या असत्य आचरण करना इतना ही सत्य का अथ नहीं है। पर सत्य यही परमेश्वर है ओर उसके सिवा दसरा कुछ नहीं है | इस सत्य की खोज और पूजा के निमित्तहूप ही और सारे नियमों की आवश्यकता है ओर उसीमेंसे उनकी उत्पत्ति है इस सत्य का उपासक अपने माने हुए देश हित के लिए भी असत्य नहीं बोलता, असत्य का आचरण नहीं करता। सत्य के

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परिशिष्ट

लिए वह श्रह्माद की भांति माता-पिता आदि बड़ों की आज्ञा भी विनय पूवेक भद्ढ करने में घर सममतता है। २--अहिसा प्राणियों का दध करना इतना ही इस वृत्त के पालने के लिये काफ़ी नहीं है। अहिंसा के माने सुद्म अन्तुओं से लेकर मनुष्य तक सभी जीवों के प्रति सम्रभाव। इन बुर्तों का पालन घोर अन्याय करनेवाले के प्रति भी क्रोध करे, बल्कि उसपर प्रेमभाव रक्खे, उसका हित चाहें और करें। पर प्रेम करता हुआ भी अन्यायी के अन्याय के वश हो, अन्याय का विरोध करे ओर वैसा करने में वह जो कष्ठ दे वह घीरज पृथक ओर अन्‍्यायी का द्वेप किए विना सहे। ३--अ्रह्मचर्य ब्रह्मचये के पालनचिना उपरोक्त ब॒तों का

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मंगलप्रभात

पालन करना अशक्य है | ब्रह्मचारी किसी सी था पुरुष पर कुद्ृष्टि करें, इतना ही बस नहीं है, किन्तु मनसे भी विपयों का चिन्तन या सेवन करे। और विवाहित हो तो अपनी स्री या अपने पति के साथ भी विषय भोग करे पर उसे मिक्र समझे कर उसके साथ निर्मल सम्बन्ध रच्खे ।अपनी या दूसरी खस्री का या अपने पति का या दूसरे पुरुष का विकार मय स्पश अथवा उसके साथ विकार-मयभाषण- था दूसरी विकार-मय चेट्ठा यह भी स्थूल ब्रह्म ' चये का भंग है| पुरुष पुरुष में या जी ब्री में या दोनों की चस्तु के सम्बन्ध में विकारमय चेष्टा भी स्थूल अह्मचय का भ्द है। ४--अस्वाद

मनुष्य जबतक जीभ के रसों को जीते तंवतक त्रह्मचय का पालन अति कठिन है, ऐसा ध्नुभव होने के कारण अखाद को भिन्न जद

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परिशिष्ट

माना गया है। भोजन केवल शरीर यात्रा के ही लिए होना चाहिए उसे ओपधि समझ कर संयमपूवक लेने -की जरूरत है। इस ब्रत का पालन करने वाला विकार उत्पन्त करनंवाले मसालों वगरह का त्याग करे। मांसाहार, मय- पान, तम्बाकू, आग इत्यादि का आश्रसमें निपेध है इस बत में खाद के लिए दावतों का था भोजन के आग्रह का निषेध है ५---अस्देय

दसरे की चीज उसकी इजाजत के विना- लेनी इतना ही इस बतब के पालनके लिए बस नहीं है। जो चीज जिस उपयोग के .लिए हमें मिली हो, उससे उसका दूसरा उपयोग करना या जितन समय के लिए मिली हो उसकी अपना अधिक सम्रयतक उपयोग करना भी चोरी है इस ब्रत के मृत्रमं सक्षम सत्य तो यद्द मीज़ूद है. कि परसात्मा प्राणियों छे लिए नित्य

3९

भगठप्रभात

की आवश्यक वस्तु द्वी नित्य उपजाता है और देता है। उससे अधिक विल्कुल् नहीं उपजाता इसलिये अपनी कमसे कम आवश्यकता के सिवा जो कुछ भी मनुष्य लेता है चह चोरी करता है ६--अपसिप्रिह

अपरिभ्रह अस्तेय के भीतर ही जाता है। अनावश्यक वस्तु जैसे ली नहीं जा सकती वैसे उसका संग्रह भी नहीं किया जा सकता इससे जिस खुराक या साज सामान की जरूरत नहीं है उसका संग्रह इस ब्रत का भह्ठ है जिसका कुर्सी के बिना काम चल सकता है वह कुर्सी रखें। अपरिग्रही अपना जीवन नित्य सादा करता जाय।

७--कायिकपरिश्रम

अस्तेय ओर अपरिग्रह के पात्तन के लिए

कायिक परिश्रम का नियम आवश्यक है।

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परिश्षिष्ट

इसकी सिवा सनुष्य मात्र शरीर निर्वाह शारी- रिक मेहनत से करें तो ही वह समाज के ओर झपने द्रोह में सं घचच सकता है। जिसके अद्ग कामदे सकते हैं ओर जिसे समझ गई है ऐसे स्त्री पुरुष अपना सारा नित्य काम जो अपने पूरा कर लेने लायक हो वह कर लेना चाहिए आर दसरेकी संवा बिना कारण नलेनी चाहिए पर बालकों की, दसरे अपद्न लोगों की और बुद्ध ह्ली पुरुषों की सेवा प्राप्त हो तब उसे करना सामाजिक जिम्मेदारी सममने वाले प्रत्येक मनुष्य का धर्म है इस आदश के अनुसार आश्रममें मज़दर जहां अनिवाय हों वहीं रखे जाते हैं, और उसके साथ मालिक नौकर का व्यवहार नहीं रखा जाता ४-स्वरेशी मनुष्य सवेशक्तिमान प्राणी नहीं है। इससे बह श्रपने पड़ोसी की सेवा करने में जगत की

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मंगलप्रमात॑

सेवा करता हैं। इस भावना का नाम स्वदेशी है। अपने निकटवालों की सेवा छोड़कर दरवालों की सबा करने या लेने दोड़ता है वह खदशी भड करता है। इस भावना के पोषण से संसार सव्यवस्थित रहे सकता है। उसके भद्ठ में अव्यवस्था हैं | इस नियम के अनुसार यधथाशक्ति हमें हमारे पड़ोसी की दूकान से ही व्यवहार रखना चाहिए, देश में जो चोज होती ही ओर सहज में हो 'सकती हो वह चीज हमें परदेश से मंगानी चाहिए। खदेशी में स्वार्थ को स्थान नहीं है। अपने को कुटुम्व के लिए कुटुम्ब को शहर फे लिए, शहर को देश के लिए और देशं को जगत के कल्याण के लिए होमना पड़ता है। <-+-अश्रय सत्य, श्रहिंसा, इत्यादि त्रत्तों का पॉलन निर्भयता बिना असंभव है। ओर वदढसान १०२

परिशिष्ट

समय में सर्वत्र भय प्याप रहा है उस दशा में निर्भयता का चिंतन ओर उसकी शिक्षा अत्य- न्‍त आवश्यक होने के कारण उसे ब्रतों में स्थान दिया गया है। जो सत्यपरायण रहना चाहे उसे तन जाति-पांति से डरना चाहिए, सर- फार से डरना चाहिए, चीर से डरना चाहिए ग़रीबी से डरना चाहिए, मौत से डरना प्वाहिए। १०--अध्पृश्यता निवारण

हिन्द-धर्म में अस्पृश्यता की रूढ़ि ने जड़ पकड़ रकक्‍्खी है उसमें धम नहीं चल्कि अघमे है, ऐसा माननेके कारण अरपृश्यता निवारण को नियम में स्थान दिया गया है, अस्पृश्य गिने

ने वालों के लिए -आश्रम में दसरी जातियों

फे जितना ही स्थान है

आश्रम जातिभेद को नहीं मानता यह आानाजाता है कि जातिभेदसे,हिन्दुधर्म को नुक़्-

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मंगलप्रभात

सानहुआ है उसमें जो ऊंच नीच ओर छूआ- छत की भावना है वह घातक है| आ्राश्रमवणो श्रम धरम को मानता है उसमें की वर्णव्यवस्था केवल घंधे के आधीन है, ऐसा जान पढ़ता है इससे वर्णनीति के अनुसार मां वाप के धंधे में से आजीविका पैदा करके शेप समय शुद्ध ज्ञान प्राप्त करने और बढ़ाने में लगावे। स्मृतियोंमे विद्यमान आश्रमव्यवा जगत का हित करने बाली है; परवर्णाश्रस घ्म मान्य होने पर भी आश्रम का जीवन ग्रीतामन्‍्य व्यापक ओर भावना प्रधानसंन्यास के आदश को सामनेरख कर रचा गया होने के कारण आश्रममें वेद को स्थान नहीं है ११--सहिष्णुवा

आश्रमका ऐसा मानना है कि जगत में प्रचलित प्रस्यातघम सत्यको व्यक्तकरनेवाले हैं | पर वे सव अपृर्ण मनुष्य द्वारा व्यक्त हुए हैं

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परिशिष्ट

इसलिए सबमें अपूर्णता का अथवा असत्य का मिश्रण हो गया है इसलिए हमें जिस प्रकार अपने धम के लिए मानहों उतना ही मान हमें दसरे के घम के प्रति भी रखना उचित है जहां ऐसी सहिणाता हो वहां एक दूसरे के घर्म का विरोध संभव नहीं होता, परघर्मी को अपने धम में लाने का प्रयत्न सम्भव होता बल्कि सव धर्मों में नो दीप हैं वे दूर हो, ऐसी ही प्राथना और ऐसी ही भावना बरावर रखनी उचित है

सरता साहित्ये मण्डल की सर्वोदिय साहित्य मांला के प्रेकाशन

२००७०००बु.;/०५०>०मू.ा०-गीण ताम पुस्तक मूल्य॑ १--दिव्य जीवन | - २--जीवन साहित्य | १) ३--तामिंल बेद ॥)

४--भारत में व्यसन और व्यभिचार ॥<) ५--सामाजिक कुरीतियाँ [जब्त अप्रा० | ॥)

६--भारत के सत््री-रत्र - ३) ७--अनोख!। [अम्राप्य | '0-) ८--अक्षचय“विज्ञान ॥|+) ९--यूरोप का इतिहास २) १०--समाज -विज्ञान १॥) १--खद्दर का संपत्तिशासत्र ॥£-) १२--गारों का प्रभुत्व ॥॥-)

१३--चीन की आवाज़ | [अम्राप्य| ॥-)

१४--दक्षिण अफ्रिका के सत्याग्रह का इतिहास १॥

१५--विजयी बारडोली [अप्राप्य|_ १)

[

१६---श्नीति की राह पर | ॥£) १७--सीता की अग्नि-परीक्षा 7) १८--कन्या शिक्षा | )) १९-..कर्पयोग [£) २०--कलवार की करतूत ) २१--व्यावहारिक सभ्यता ! ॥) २२--अ्न्धरे में उत्नाला ॥)

२३--स्वामी जी का बलिदान। [अग्राप्य | |-) २४--हमारे जमाने की गुलामी | [जब्त अ० |

२५--ल्ली और पुरुष | ॥) २६--सफ़ाई | ) २७--क्या करें ? १) २८--हाथ की कताई बुनाई [अग्राष्य] ॥) २९--आत्मोपदेश [ ३०--यथार्थ आदर्श जीवन | [अग्राप्य] ॥“) ३१--जब अंग्रेज नहीं आये थे। |) ३२--गंगा गोविन्द्सिह [अमप्राप्य।[ ॥*) ३३--श्री राम चरित्र १)

३४--आश्रम-हरिणी )

[

३५--हिन्दी-मराठी-कोप २) ३६--स्वाधीनता के सिद्धान्त !) ३७--महान्‌ साठ्ख की ओर | ॥॥८) ३८--शिवाजी की योग्यता (&) ३९--तरंगित हृदय ॥) ४०--द्वालैण्ड की राज्यक्रान्ति ९॥) ४१-टुखी दुनिया [<) ४२--जिन्दा लाश | ॥) ४३--आत्म-कथा | १॥) ४४--जब अंग्रेज आये [जब्त अग्रा०] १) ४५--जीवन-विकास १) १॥) ४६--फिसानों का विगुल | जिव्व अग्रा०] ८) ४७--फांसी ।£)

४८--अनासक्तियोग ओर गीतावोध ।. ।#]) ४९--खर्ण विहान | [जब्त अश्राप्य६ 5) ५०--मराठों का उत्थान ओर पतन। १॥) ५१--भाई के पत्र श) २) ५२--स््रगत | (+) ५३--थुगधम | [जिव्त अप्राप्प]_- १«)

[ )]

५४--श्री समस्या। १॥) सजिल्द २) ५५--विदेशी कपड़े का मुकावज्ञा। ॥£) ५६--चित्रपद &) ५७--राष्ट्रवाणी [अग्राप्य | ॥<) ५८--इड्लैण्ड में महात्मा जी | १) ५९---रोटी का सवाल | १) ६०-देवी सम्पद | |) ६९--जीवन-सूत्र। ॥॥ ६२--हमारा कलझूु ॥£) ६३--वुद्बुद्‌ |) ६४--संघप या सहयोग ? १) ६५--गांधी-चिचार दोहन ॥) ६६--एशिया की क्रान्ति। [ जब्त अम्रा० | १॥) ६७--हसारे राष्ट्र-निर्मावा २॥) ३) ६८--खतन्त्रता की ओर | १॥) ६९---आगे बढ़ो | ॥) ७०--चुद्ध-वाणी | ॥£) ७१- कांग्रेस का इतिहास १॥)

७२--हमारे राष्ट्रपति . १)

[५

७३--मेरी कहानी ४) ७४४--विश्व इतिहास की केजक ) ८) ७७--हसारे किसानों का सवात् | ) ७६--नया शासन विधान | ॥) ७७--हमारे गांवों.की कहानी ॥)

आगे प्रकाशित होने वाले ग्रन्थ

१--गाँवीवाद, समाजवाद

२--विनाश या इलाज

३--गीतामंथन |

५--राजनी ति ग्रवेशिका

"->मत्र से अंग्रेज़ आये |

६--महाभारत के पात्र |

७--संतवाणी |

८-गाँवी साहित्य-माला। ( १५ भागों में ) नवजीवन माला की पुस्तके

१--गीतावोध गांबी जी | “)॥ २--मद्णुलप्रभात ,, “)॥| ३->अनासक्तियोग | +) श्लोक सहित %)

गॉंधी-साहित्य-मार्ला'

[ एक योजना |]

महात्माजी के अब तक के चुने हुए लेखों ओर भाषणों का विपयवार संग्रह 'मण्डल्न से चड़े पेसाने पर निकालने का आयोजन हो रहा है। माला में १५-२० पुस्तकें होंगी। प्रष्ठ संख्या २२५-२५० के लगभग रहेगी ओर दाम ॥) होगा इसके भ्राहक बनने की कोई प्रवेशफीस नहों रक्खी गई है| लेकिन एक शर्ते यह जहूर होगी--इसके स्थायी ग्राहकों को माला की सारी पुस्तक खरोदनी होंगी जो इस प्रकार अपना नाम लिखावेंगे उनको पुस्तकें पोने मूल्य में मिलेंगी विशेप विवरण के लिए त्िखें।

संसता साहित्य मण्डल, द्ल्ली